भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2115

भारत! तदनन्तर जैसे पूर्णिमाको वायुकी प्रेरणासे समुद्रका वेग बढ़ जानेसे उसकी भीषण गर्जना सुनायी पड़ती है, उसी प्रकार आपकी सेनाका महान् कोलाहल प्रकट हुआ॥ १४॥ अपराह्ने महाराज संग्रामः समपद्यत । पर्जन्यसमनिर्घोषो भीष्मस्य सह पाण्डवैः ॥ १५ ॥ महाराज! अपराह्नकालमें पाण्डवोंके साथ भीष्मका भीषण संग्राम आरम्भ हुआ, जिसमें मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर घोष हो रहा था ॥ १५ ॥ ततो राजंस्तव सुता भीमसेनमुपादद्रवन् । परिवार्य रणे द्रोणं वसवो वासवं यथा ॥ १६ ॥ राजन्! तब आपके पुत्र, जैसे वसुगण इन्द्रके सब ओर खड़े होते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यको चारों ओरसे घेरकर रणभूमिमें भीमसेनपर टूट पड़े ॥ १६ ॥ ततः शान्तनवो भीष्मः कृपश्च रथिनां वरः । भगदत्तः सुशर्मा च धनंजयमुपादद्रवन् ॥ १७ ॥ तत्पश्चात् शान्तनुनन्दन भीष्म, रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्य, भगदत्त और सुशर्माने अर्जुनपर धावा किया ॥ १७ ॥ हार्दिक्यो बाह्लिकश्चैव सात्यकिं समभिद्रुतौ । अम्बष्ठकस्तु नृपतिरभिमन्युमवस्थितः ॥ १८ ॥ कृतवर्मा और बाह्लिक सात्यकिपर टूट पड़े। राजा अम्बष्ठने अभिमन्युका सामना किया ॥ १८ ॥ शेषास्त्वन्ये महाराज शेषानेव महारथान् । ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ १९ ॥ महाराज! शेष अन्य महारथियोंने शत्रुपक्षके शेष महारथियोंपर आक्रमण किया। फिर तो उनमें घोर एवं भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ ॥ १९ ॥ भीमसेनस्तु सम्प्रेक्ष्य पुत्रांस्तव जनेश्वर । प्रजज्वाल रणे क्रुद्धो हविषा हव्यवाडिव ॥ २० ॥ जनेश्वर! जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्निदेव प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार रणक्षेत्रमें आपके पुत्रोंको देखकर भीमसेन क्रोधसे जल उठे ॥ २० ॥ पुत्रास्तु तव कौन्तेयं छादयाञ्चक्रिरे शरैः । प्रावृषीव महाराज जलदा इव पर्वतम् ॥ २१ ॥ परंतु महाराज! आपके पुत्रोंने कुन्तीनन्दन भीमको अपने बाणोंसे उसी प्रकार आच्छादित कर दिया, जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल पर्वतको जलकी धाराओंसे ढक लेते हैं ॥ २१ ॥ स च्छाद्यमानो बहुधा पुत्रैस्तव विशाम्पते ।