महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2118, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंविरथं रथिनां श्रेष्ठं वारयामास सायकैः ॥ ३८ ॥ अभिमन्युने रथियोंमें श्रेष्ठ लोकविख्यात राजा अम्बष्ठको सायकोंद्वारा रथहीन करके आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३८ ॥
विरथो वध्यमानस्तु सौभद्रेण यशस्विना । अवप्लुत्य रथात् तूर्णमम्बष्ठो वसुधाधिपः ॥ ३९ ॥ असिं चिक्षेप समरे सौभद्रस्य महात्मनः । आरुरोह रथं चैव हार्दिक्यस्य महाबलः ॥ ४० ॥ यशस्वी सुभद्राकुमार अभिमन्युसे पीड़ित एवं रथहीन होकर राजा अम्बष्ठ अपने रथसे कूद पड़े और महामना सुभद्राकुमारपर उन्होंने रणक्षेत्रमें तलवार चलायी। फिर वे महाबली नरेश कृतवर्माके रथपर जा बैठे ॥ ३९-४० ॥
आपतन्तं तु निस्त्रिंशं युद्धमार्गविशारदः । लाघवाद् व्यंसयामास सौभद्रः परवीरहा ॥ ४१ ॥ युद्धके पैतरोंको जाननेमें कुशल तथा शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने अपनी ओर आती हुई अम्बष्ठकी तलवारको अपनी फुर्तीके कारण निष्फल कर दिया ॥ ४१ ॥
व्यंसितं वीक्ष्य निस्त्रिंशं सौभद्रेण रणे तदा । साधु साध्विति सैन्यानां प्रणादोऽभूद् विशाम्पते ॥ ४२ ॥ प्रजानाथ! उस समय रणक्षेत्रमें अम्बष्ठकी चलायी हुई तलवारको सुभद्राकुमारद्वारा निष्फल की गयी देख समस्त सैनिकोंके मुखसे निकली हुई ‘साधु-साधु’ (वाह-वाह)-की ध्वनि गूँज उठी ॥ ४२ ॥
धृष्टद्युम्नमुखास्त्वन्ये तव सैन्यमयोधयन् । तथैव तावकाः सर्वे पाण्डुसैन्यमयोधयन् ॥ ४३ ॥ धृष्टद्युम्न आदि अन्य महारथी आपकी सेनाके साथ तथा आपके प्रमुख सैनिक पाण्डव-सेनाके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४३ ॥
तत्राक्रन्दो महानासीत् तव तेषां च भारत । (पाण्डवानां च राजेन्द्र सैनिकानां सुदारुणः ।) निघ्नतां दृढमन्योन्यं कुर्वतां कर्म दुष्करम् ॥ ४४ ॥ भारत! राजेन्द्र! एक-दूसरेपर सुदृढ़ प्रहार और दुष्कर पराक्रम करनेवाले आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंमें अत्यन्त भयंकर महान् संग्राम होने लगा ॥ ४४ ॥
अन्योन्यं हि रणे शूराः केशेष्वाक्षिप्य मानिनः । नखदन्तैरयुध्यन्त मुष्टिभिर्जानुभिस्तथा ॥ ४५ ॥ कितने ही मानी शूरवीर उस रणक्षेत्रमें एक-दूसरेके केश पकड़कर नखों, दाँतों, मुक्कों और घुटनोंसे प्रहार करते हुए लड़ रहे थे ॥ ४५ ॥