महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2171, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुणवत्सु कथं द्वेषं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । कृतवान् पाण्डुपुत्रेषु पापात्मा लोभमोहितः ॥ ४० ॥ पापात्मा राजा धृतराष्ट्रने लोभसे मोहित होकर गुणवान् पाण्डवोंसे द्वेष क्यों किया? ॥ ४० ॥
एवं बहुविधा वाचः श्रूयन्ते स्म परस्परम् । पाण्डवस्तवसंयुक्ताः पुत्राणां ते सुदारुणाः ॥ ४१ ॥ महाराज! इस प्रकार वहाँ परस्पर कही हुई पाण्डवोंकी प्रशंसा तथा आपके पुत्रोंकी अत्यन्त भयंकर निन्दासे युक्त नाना प्रकारकी बातें सुनायी पड़ती थीं ॥ ४१ ॥
ता निशम्य ततो वाचः सर्वयोधैरुदाहृताः । आगस्कृत् सर्वलोकस्य पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ४२ ॥ भीष्मं द्रोणं कृपं चैव शल्यं चोवाच भारत । युध्यध्वमनहंकाराः किं चिरं कुरुथेति च ॥ ४३ ॥ भारत! तब सम्पूर्ण योद्धाओंके मुखसे निकली हुई उन बातोंको सुनकर सम्पूर्ण लोकोंका अपराध करनेवाले आपके पुत्र दुर्योधनने भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे कहा—‘आपलोग अहंकार छोड़कर युद्ध करें; विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ ॥ ४२-४३ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरूणां पाण्डवैः सह । अक्षद्यूतकृतं राजन् सुघोरं वैशसं तदा ॥ ४४ ॥ राजन्! तदनन्तर कौरवोंका पाण्डवोंके साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा, जो कपटपूर्ण द्यूतके कारण सम्भव हुआ था और जिसमें बड़ी भारी मारकाट मच रही थी ॥
यत् पुरा न निगृह्णासि वार्यमाणो महात्मभिः । वैचित्रवीर्य तस्येदं फलं पश्य सुदारुणम् ॥ ४५ ॥ विचित्रवीर्यनन्दन महाराज धृतराष्ट्र! पूर्वकालमें महात्मा पुरुषोंके मना करनेपर भी जो आपने उनकी बातें नहीं मानीं, उसीका यह भयंकर फल प्राप्त हुआ है, इसे देखिये ॥ ४५ ॥
न हि पाण्डुसुता राजन् ससैन्याः सपदानुगाः । रक्षन्ति समरे प्राणान् कौरवा वापि संयुगे ॥ ४६ ॥ राजन्! सेना और सेवकोंसहित पाण्डव अथवा कौरव समरभूमिमें अपने प्राणोंकी रक्षा नहीं करते हैं—प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध कर रहे हैं ॥ ४६ ॥
एतस्मात् कारणाद् घोरो वर्तते स्वजनक्षयः । दैवाद् वा पुरुषव्याघ्र तव चापनयान्नृप ॥ ४७ ॥ पुरुषसिंह! नरेश्वर! इस कारणसे अथवा दैवकी प्रेरणासे या आपके ही अन्यायसे होनेवाले इस युद्धमें स्वजनोंका घोर संहार हो रहा है ॥ ४७ ॥