महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2221, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्मजीका शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी इच्छा प्रकट करना
'महाबाहो! युद्धमें महाबली भीष्म तुम्हें पीड़ा नहीं दे सकते, इसलिये आज यत्नपूर्वक इनके ऊपर धावा करो ।।
अहत्वा समरे भीष्मं यदि यास्यसि मारिष ।
अवहास्योऽस्य लोकस्य भविष्यसि मया सह ।। ५४ ।।
'आर्य! यदि समरभूमिमें भीष्मको मारे बिना लौट जाओगे तो मेरे सहित तुम इस लोकमें उपहासके पात्र बन जाओगे ।। ५४ ।।
नावहास्या यथा वीर भवेम परमाहवे ।
तथा कुरु रणे यत्नं साधयस्व पितामहम् ।। ५५ ।।
'वीर! इस महायुद्धमें जैसे भी हमलोग हँसीके पात्र न बनें, वैसा प्रयत्न करो। रणक्षेत्रमें पितामह भीष्मको अवश्य मार डालो ।। ५५ ।।
अहं ते रक्षणं युद्धे करिष्यामि महाबल ।
वारयन् रथिनः सर्वान् साधयस्व पितामहम् ।। ५६ ।।
'महाबली वीर! इस युद्धमें मैं सब रथियोंको रोककर सदा तुम्हारी रक्षा करता रहूँगा। तुम पितामहको मारनेका कार्य सिद्ध कर लो ।। ५६ ।।