महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2222, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रोणं च द्रोणपुत्रं च कृपं चाथ सुयोधनम् । चित्रसेनं विकर्णं च सैन्धवं च जयद्रथम् ॥ ५७ ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजं च सुदक्षिणम् । भगदत्तं तथा शूरं मागधं च महाबलम् ॥ ५८ ॥ सौमदत्तिं तथा शूरमार्ष्यशृङ्गिं च राक्षसम् । त्रिगर्तराजं च रणे सह सर्वैर्महारथैः ॥ ५९ ॥ अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् । 'मैं द्रोणाचार्य, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, कृपाचार्य, दुर्योधन, चित्रसेन, विकर्ण, सिन्धुराज जयद्रथ, अवन्तीके राजकुमार विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण, शूरवीर भगदत्त, महाबली मगधराज, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, राक्षस अलम्बुष तथा त्रिगर्तराज सुशर्माको रणक्षेत्रमें सब महारथियोंके साथ उसी प्रकार रोक रखूँगा, जैसे तटभूमि समुद्रको आगे बढ़ने नहीं देती है ॥ ५७—५९ १/२ ॥ कुरूंश्च सहितान् सर्वान् युध्यमानान् महाबलान् । निवारयिष्यामि रणे साधयस्व पितामहम् ॥ ६० ॥ 'युद्धमें एक साथ लगे हुए समस्त महाबली कौरवोंको भी मैं युद्धस्थलमें आगे बढ़नेसे रोक दूँगा। तुम पितामह भीष्मके वधका कार्य सिद्ध करो' ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मशिखण्डीसमागमे अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म और शिखण्डीका समागमविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६० १/२ श्लोक हैं।]