महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2260, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय कृपाचार्य, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ तथा अवन्तीके विन्द और अनुविन्दने भी युद्धको नहीं छोड़ा ॥ २२ ॥ ततो भीमो महेष्वासः फाल्गुनश्च महारथः । कौरवाणां चमूं घोरां भृशं दुद्रुवत्तू रणे ॥ २३ ॥ तदनन्तर महाधनुर्धर भीमसेन तथा महारथी अर्जुन रणक्षेत्रमें कौरवोंकी उस भयंकर सेनाको जोर-जोरसे खदेड़ने लगे ॥ २३ ॥ ततो बर्हिणवाजानामयुतान्यर्बुदानि च । धनंजयरथे तूर्णं पातयन्ति स्म भूमिपाः ॥ २४ ॥ तब बहुत-से भूमिपाल मिलकर तुरंत ही अर्जुनके रथपर मोरपंखयुक्त अनेक अयुत एवं अर्बुद बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २४ ॥ ततस्ताञ्शरजालेन संनिवार्य महारथान् । पार्थः समन्तात् समरे प्रेषयामास मृत्यवे ॥ २५ ॥ तब अर्जुनने सब ओरसे बाणोंका जाल-सा बिछाकर उन महारथी भूमिपालोंको रोक दिया और तुरंत ही उन्हें मृत्युके लोकमें पहुँचा दिया ॥ २५ ॥ शल्यस्तु समरे जिष्णुं क्रीडन्निव महारथः । आजघानोरसि क्रुद्धो भल्लैः संनतपर्वभिः ॥ २६ ॥ तब महारथी शल्यने क्रीड़ा करते हुए-से कुपित हो समरभूमिमें झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा अर्जुनकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २६ ॥ तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा हस्तावापं च पञ्चभिः । अथैनं सायकैस्तीक्ष्णैर्भृशं विव्याध मर्मणि ॥ २७ ॥ यह देख अर्जुनने पाँच बाणोंसे उनके धनुष और दस्तानेको काटकर तीखे सायकोंद्वारा उनके मर्मस्थलमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ २७ ॥ अथान्यद् धनुरादाय समरे भारसाधनम् । मद्रेश्वरो रणे जिष्णुं ताडयामास रोषितः ॥ २८ ॥ त्रिभिः शरैर्महाराज वासुदेवं च पञ्चभिः । भीमसेनं च नवभिर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २९ ॥ महाराज! फिर मद्रराजने भी भारसाधनमें समर्थ दूसरा धनुष लेकर रणभूमिमें अर्जुनपर रोषपूर्वक तीन बाणोंद्वारा प्रहार किया। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको पाँच बाणोंसे घायल करके उन्होंने भीमसेनकी भुजाओं तथा छातीमें नौ बाण मारे ॥ २८-२९ ॥ ततो द्रोणो महाराज मागधश्च महारथः । दुर्योधनसमादिष्टौ तं देशमुपजग्मतुः ॥ ३० ॥ यत्र पार्थो महाराज भीमसेनश्च पाण्डवः । कौरव्यस्य महासेनां जघ्नतुः सुमहारथौ ॥ ३१ ॥