भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 2266

‘इसलिये यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो अर्जुन तथा पांचालों और सृंजयोंको आगे करके मेरे वधके लिये प्रयत्न करो’॥ १५ ॥ तस्य तन्मतमाज्ञाय पाण्डवः सत्यदर्शनः। भीष्मं प्रति ययौ राजा संग्रामे सह सृंजयैः॥ १६॥ भीष्मके इस अभिप्रायको जानकर सत्यदर्शी पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिर रणभूमिमें सृंजयवीरोंको साथ ले भीष्मकी ओर आगे बढ़े॥ १६॥ धृष्टद्युम्नस्ततो राजन् पाण्डवश्च युधिष्ठिरः। श्रुत्वा भीष्मस्य तां वाचं चोदयामासुतुर्बलम्॥ १७॥ अभिद्रवध्वं युध्यध्वं भीष्मं जयत संयुगे। रक्षिताः सत्यसंधेन जिष्णुना रिपुजिष्णुना॥ १८॥ राजन्! उस समय भीष्मजीका वह वचन सुनकर धृष्टद्युम्न और पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपनी सेनाको आज्ञा दी—‘वीरो! आगे बढ़ो। युद्ध करो और संग्राममें भीष्मपर विजय पाओ। तुम सब लोग शत्रुविजयी सत्यप्रतिज्ञ अर्जुनके द्वारा सुरक्षित हो॥ १७-१८॥ अयं चापि महेष्वासः पार्षतो वाहिनीपतिः। भीमसेनश्च समरे पालयिष्यति वो ध्रुवम्॥ १९॥ ‘ये महाधनुर्धर सेनापति धृष्टद्युम्न तथा भीमसेन भी समरांगणमें निश्चय ही तुम सब लोगोंकी रक्षा करेंगे॥ १९॥ मा वो भीष्माद् भयं किञ्चिदस्त्वद्य युधि संजयाः। ध्रुवं भीष्मं विजेष्यामः पुरस्कृत्य शिखण्डिनम्॥ २०॥ ‘सृंजय वीरो! आज तुम युद्धमें भीष्मजीसे तनिक भी भय न करो। हम शिखण्डीको आगे करके भीष्मपर अवश्य ही विजय पायेंगे’॥ २०॥ ते तथा समयं कृत्वा दशमेऽहनि पाण्डवाः। ब्रह्मलोकपरा भूत्वा संजग्मुः क्रोधमूर्च्छिताः॥ २१॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्य पाण्डवं च धनंजयम्। भीष्मस्य पातने यत्नं परमं ते समास्थिताः॥ २२॥ तब वे पाण्डव सैनिक दसवें दिन वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा करके ब्रह्मलोकको अपना लक्ष्य बनाकर क्रोधसे मूर्च्छित हो शिखण्डी तथा पाण्डुपुत्र अर्जुनको आगे करके आगे बढ़े और भीष्मको मार गिरानेका महान् प्रयत्न करने लगे॥ २१-२२॥ ततस्तव सुतादिष्टा नानाजनपदेश्वराः। द्रोणेन सहपुत्रेण सहसेना महाबलाः॥ २३॥ तदनन्तर आपके पुत्रकी आज्ञा पाकर नाना देशोंके स्वामी महाबली नरेशगण अपनी विशाल सेनासहित द्रोण तथा अश्वत्थामाके साथ अग्रसर हुए॥ २३॥ दुःशासनश्च बलवान् सह सर्वैः सहोदरैः।