भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 2268, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 2268

शिखण्डी तथा पाण्डुपुत्र अर्जुनपर आपके पुत्रोंने समस्त राजाओंको साथ लेकर युद्धस्थलमें आक्रमण किया। वे उन दोनोंको मार डालना चाहते थे ॥ ३२ ॥ तस्मिन्नतिमहाभीमे सेनयोर्वै पराक्रमे । सम्प्रधावत्स्वनीकेषु मेदिनी समकम्पत ॥ ३३ ॥ इस प्रकार उन दोनों सेनाओंके वीर जब अत्यन्त भयानक पराक्रम प्रकट करने लगे और समस्त सैनिक इधर-उधर दौड़ने लगे; उस समय यह सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ३३ ॥ तान्यनीकान्यनीकेषु समसज्जन्त भारत । तावकानां परेषां च दृष्ट्वा शान्तनवं रणे ॥ ३४ ॥ भारत! आपके और शत्रुपक्षके सब सैनिक युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको देखकर विरोधी सैनिकोंके साथ जमकर युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥ ततस्तेषां प्रतप्तानामन्योन्यमभिधावताम् । प्रादुरासीन्महाशब्दो दिक्षु सर्वासु भारत ॥ ३५ ॥ भरतनन्दन! एक दूसरेपर धावा करनेवाले उन संतप्त सैनिकोंका महान् कोलाहल सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो गया ॥ ३५ ॥ शङ्खदुन्दुभिघोषश्च वारणानां च बृंहितैः । सिंहनादश्च सैन्यानां दारुणः समपद्यत ॥ ३६ ॥ शंखों और दुन्दुभियोंका गम्भीर घोष तथा हाथियोंकी गर्जनाके साथ सैनिकोंका सिंहनाद बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ ३६ ॥ सा च सर्वनरेन्द्राणां चन्द्रार्कसदृशी प्रभा । वीराङ्गदकिरीटेषु निष्प्रभा समपद्यत ॥ ३७ ॥ समस्त राजाओंकी चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाली प्रभा वीरोंके अंगद और किरीटोंके सामने अत्यन्त फीकी पड़ गयी ॥ ३७ ॥ रजोमेघास्तु संजज्ञुः शस्त्रविद्युद्विरावृताः । धनुषां चापि निर्घोषो दारुणः समपद्यत ॥ ३८ ॥ धूल मेघोंकी घटा-सी छा गयी। उसमें अस्त्र-शस्त्रोंकी चमक बिजलीकी प्रभाके समान व्याप्त हो रही थी, धनुषोंकी टंकारध्वनि अत्यन्त भयंकर प्रतीत होने लगी ॥ बाणशङ्खप्रणादाश्च भेरीणां च महास्वनाः । रथघोषश्च संजज्ञे सेनयोरुभयोरपि ॥ ३९ ॥ बाणों, शंखों तथा भेरियोंके सम्मिलित शब्द जोर-जोरसे सुनायी देने लगे। साथ ही दोनों सेनाओंमें रथोंकी घरघराहट भी दूरतक फैलने लगी ॥ ३९ ॥ प्रासशक्त्यृष्टिसङ्घैश्च बाणौघैश्च समाकुलम् । निष्प्रकाशमिवाकाशं सेनयोः समपद्यत ॥ ४० ॥