महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2284, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरंतु जनेश्वर! उसके चलाये हुए वे बाण आपके ताऊके शरीरमें कोई घाव या वेदना नहीं उत्पन्न कर पाते थे। गंगानन्दन भीष्म उस समय मुसकराते हुए उन बाणोंकी चोट सह रहे थे ॥ २३ ॥
उष्णार्तो हि नरो यद्वज्जलधाराः प्रतीच्छति । तथा जग्राह गाङ्गेयः शरधाराः शिखण्डिनः ॥ २४ ॥ जैसे गर्मीसे कष्ट पानेवाला मनुष्य अपने ऊपर जलकी धारा ग्रहण करता है, उसी प्रकार गंगानन्दन भीष्म शिखण्डीकी बाणधाराको ग्रहण कर रहे थे ॥ २४ ॥
तं क्षत्रिया महाराज ददृशुर्घोरमाहवे । भीष्मं दहन्तं सैन्यानि पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ २५ ॥ महाराज! उस युद्धस्थलमें समस्त क्षत्रियोंने देखा, भयंकर रूपधारी भीष्म महामना पाण्डवोंकी सेनाओंको दग्ध कर रहे थे ॥ २५ ॥
ततोऽब्रवीत्तव सुतः सर्वसैन्यानि मारिष । अभिद्रवत संग्रामे फाल्गुनं सर्वतो रणे ॥ २६ ॥ आर्य! उस समय आपके पुत्रने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा—'वीरो! तुमलोग समरभूमिमें अर्जुनपर चारों ओरसे धावा करो ॥ २६ ॥
भीष्मो वः समरे सर्वान् पालयिष्यति धर्मवित् । ते भयं सुमहत् त्यक्त्वा पाण्डवान् प्रति युध्यत ॥ २७ ॥ 'धर्मज्ञ भीष्म समरांगणमें तुम सब लोगोंकी रक्षा करेंगे। अतः तुमलोग महान् भयका परित्याग करके पाण्डवोंके साथ युद्ध करो ॥ २७ ॥
हेमतालेन महता भीष्मस्तिष्ठति पालयन् । सर्वेषां धार्तराष्ट्राणां समरे शर्म वर्म च ॥ २८ ॥ 'सुवर्णमय तालचिह्नसे युक्त विशाल ध्वजसे सुशोभित होनेवाले भीष्मजी हम सबकी रक्षा करते हुए युद्धके मैदानमें खड़े हैं। हम सभी धृतराष्ट्रपुत्रोंके लिये ये ही कल्याणकारी आश्रय और कवच हैं ॥ २८ ॥
त्रिदशाऽपि समुद्युक्ता नालं भीष्मं समासितुम् । किमु पार्था महात्मानं मर्त्यभूता महाबलाः ॥ २९ ॥ 'यदि सम्पूर्ण देवता भी एकत्र हो युद्धके लिये उद्योग करें तो वे भी भीष्मका सामना करनेमें समर्थ नहीं हो सकते; फिर कुन्तीके महाबली पुत्र तो मरणधर्मा मनुष्य ही हैं। वे उन महात्मा भीष्मका सामना क्या कर सकते हैं? ॥ २९ ॥
तस्माद् द्रवत मा योधाः फाल्गुनं प्राप्य संयुगे । अहमद्य रणे यत्तो योधयिष्यामि पाण्डवम् ॥ ३० ॥ सहितः सर्वतो यत्तैर्भवद्भिर्वसुधाधिपैः ।