महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः कथास्ते समवाययुक्ताः कृत्वा विचित्राः पुरुषप्रवीराः । तस्थुर्मुहूर्तं परिचिन्तयन्तः कृष्णं नृपास्ते समुदीक्षमाणाः ॥ ८ ॥ तदनन्तर उन शूरवीर पुरुषोंने समाजमें जैसी बातचीत करनी उचित है, वैसी ही विविध प्रकारकी विचित्र बातें कीं। फिर वे सब नरेश भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए दो घड़ीतक कुछ सोचते हुए चुप बैठे रहे ॥ ८ ॥
कथान्तमासाद्य च माधवेन संघट्टिताः पाण्डवकार्यहेतोः । ते राजसिंहाः सहिता ह्यशृण्वन् वाक्यं महार्थं सुमहोदयं च ॥ ९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके कार्यके लिये ही उन श्रेष्ठ राजाओंको संगठित किया था। जब उन सब लोगोंकी बातचीत बंद हो गयी, तब वे सिंहके समान पराक्रमी नरेश एक साथ श्रीकृष्णके सारगर्भित तथा श्रेष्ठ फल देनेवाले वचन सुनने लगे ॥ ९ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
सर्वैर्भवद्भिर्विदितं यथायं युधिष्ठिरः सौबलेनाक्षवत्याम् । जितो निकृत्यापहृतं च राज्यं वनप्रवासे समयः कृतश्च ॥ १० ॥ **श्रीकृष्णने भाषण देना प्रारम्भ किया—**उपस्थित सुहृद्गण! आप सब लोगोंको यह मालूम ही है कि सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें किस प्रकार कपट करके धर्मात्मा युधिष्ठिरको परास्त किया और इनका राज्य छीन लिया है। उस जूएमं यह शर्त रख दी गयी थी कि जो हारे, वह बारह वर्षोंतक वनवास और एक वर्षतक अज्ञातवास करे ॥ १० ॥
शक्तैर्विजेतुं तरसा महीं च सत्ये स्थितैः सत्यरथैर्यथावत् । पाण्डोः सुतैस्तद् व्रतमुग्ररूपं वर्षाणि षट् सप्त च चीर्णमग्र्यैः ॥ ११ ॥ पाण्डव सदा सत्यपर आरूढ़ रहते हैं। सत्य ही इनका रथ (आश्रय) है। इनमें वेगपूर्वक समस्त भूमण्डल-को जीत लेनेकी शक्ति है तथापि इन वीराग्रगण्य पाण्डु-कुमारोंने सत्यका खयाल करके तेरह वर्षोंतक वनवास और अज्ञातवासके उस कठोर व्रतका धैर्यपूर्वक पालन किया है, जिसका स्वरूप बड़ा ही उग्र है ॥ ११ ॥
त्रयोदशश्चैव सुदुस्तरोऽय-