महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरमात्माका न तो साधुकर्मसे सम्बन्ध है और न असाधुकर्मसे। यह विषमता तो देहाभिमानी मनुष्योंमें ही देखी जाती है। ब्रह्मका स्वरूप सर्वत्र समान ही समझना चाहिये। इस प्रकार ज्ञानयोगसे युक्त होकर आनन्दमय ब्रह्मको ही पानेकी इच्छा करनी चाहिये। उस सनातन परमात्माका योगीलोग साक्षात्कार करते हैं ।। २३ ।।
नास्यातिवादा हृदयं तापयन्ति नानधीतं नाहतमग्निहोत्रम् । मनो ब्राह्मी लघुतामादधीत प्रज्ञां चास्मै नाम धीरा लभन्ते । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ।। २४ ।।
इस ब्रह्मवेत्ता पुरुषके हृदयको निन्दाके वाक्य संतप्त नहीं करते। 'मैंने स्वाध्याय नहीं किया, अग्निहोत्र नहीं किया' इत्यादि बातें भी उसके मनमें तुच्छ भाव नहीं उत्पन्न करतीं। ब्रह्मविद्या शीघ्र ही उसे वह स्थिरबुद्धि प्रदान करती है, जिसे धीर पुरुष ही प्राप्त करते हैं। उस सनातन परमात्माका योगीजन साक्षात्कार करते हैं ।। २४ ।।
एवं यः सर्वभूतेषु आत्मानमनुपश्यति । अन्यत्रान्यत्र युक्तेषु किं स शोचेत् ततः परम् ।। २५ ।।
इस प्रकार जो समस्त भूतोंमें परमात्माको निरन्तर देखता है, वह ऐसी दृष्टि प्राप्त होनेके अनन्तर अन्यान्य विषयभोगोंमें आसक्त मनुष्योंके लिये क्या शोक करे? ।।
यथोदपाने महति सर्वतः सम्प्लुतोदके । एवं सर्वेषु वेदेषु आत्मानमनुजानतः ।। २६ ।।
जैसे सब ओर जलसे परिपूर्ण बड़े जलाशयके प्राप्त होनेपर जलके लिये अन्यत्र जानेकी आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार आत्मज्ञानीके लिये सम्पूर्ण वेदोंमें कुछ भी प्राप्त करनेयोग्य शेष नहीं रह जाता ।।
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो महात्मा न दृश्यते सौहृदि संनिविष्टः । अजश्वरो दिवारात्रमतन्द्रितश्च स तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ।। २७ ।।
यह अंगुष्ठमात्र अन्तर्यामी परमात्मा सबके हृदयके भीतर स्थित है, किंतु सबको दिखायी नहीं देता। वह अजन्मा, चराचरस्वरूप और दिन-रात सावधान रहनेवाला है। जो उसे जान लेता है, वह ज्ञानी परमानन्दमें निमग्न हो जाता है ।। २७ ।।