महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका द्वारकागमन, विराट और द्रुपदके संदेशसे राजाओंका पाण्डवपक्षकी ओरसे युद्धके लिये आगमन
वासुदेव उवाच
उपपन्नमिदं वाक्यं सोमकानां धुरंधरे ।
अर्थसिद्धिकरं राज्ञः पाण्डवस्यामितौजसः ॥ १ ॥
(तत्पश्चात् भगवान्) श्रीकृष्णने कहा—सभासदो! सोमकवंशके धुरंधर वीर महाराज द्रुपदने जो बात कही है, वह उन्हींके योग्य है। इसीसे अमित तेजस्वी पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरके अभीष्ट कार्यकी सिद्धि हो सकती है ॥ १ ॥
एतच्च पूर्वं कार्यं नः सुनीतमभिकाङ्क्षताम् ।
अन्यथा ह्याचरन् कर्म पुरुषः स्यात् सुबालिशः ॥ २ ॥
हमलोग सुनीतिकी इच्छा रखनेवाले हैं; अतः हमें सबसे पहले यही कार्य करना चाहिये। जो अवसरके विपरीत आचरण करता है, वह मनुष्य अत्यन्त मूर्ख माना जाता है ॥ २ ॥
किं तु सम्बन्धकं तुल्यमस्माकं कुरुपाण्डुषु ।
यथेष्टं वर्तमानेषु पाण्डवेषु च तेषु च ॥ ३ ॥
परंतु हमलोगोंका कौरवों और पाण्डवोंसे एक-सा सम्बन्ध है। पाण्डव और कौरव दोनों ही हमारे साथ यथायोग्य अनुकूल बर्ताव करते हैं ॥ ३ ॥
ते विवाहार्थमानीता वयं सर्वे तथा भवान् ।
कृते विवाहे मुदिता गमिष्यामो गृहान् प्रति ॥ ४ ॥
इस समय हम और आप सब लोग विवाहोत्सवमें निमन्त्रित होकर आये हैं। विवाहकार्य सम्पन्न हो गया; अतः अब हम प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको लौट जायँगे ॥ ४ ॥
भवान् वृद्धतमो राज्ञां वयसा च श्रुतेन च ।
शिष्यवत् ते वयं सर्वे भवामेह न संशयः ॥ ५ ॥
आप समस्त राजाओंमें अवस्था तथा शास्त्रज्ञान दोनों ही दृष्टियोंसे सबकी अपेक्षा बड़े हैं। इसमें संदेह नहीं कि हम सब लोग आपके शिष्यके समान हैं ॥ ५ ॥
भवन्तं धृतराष्ट्रश्च सततं बहु मन्यते ।
आचार्ययोः सखा चासि द्रोणस्य च कृपस्य च ॥ ६ ॥