भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 455

उस समय पाण्डवोंके प्रति कितनी ही कठोर बातें कही जा रही थीं, परंतु मेरे पुत्र सारा राज्य जीतते चले जा रहे हैं, यह जानकर आप उनकी उपेक्षा करते जाते थे। यह सब इनके भावी विनाश या पतनका कारण होगा, इसकी ओर आपकी दृष्टि नहीं जाती थी ॥ ६ ॥ पित्र्यं राज्यं महाराज कुरवस्ते सजाङ्गलाः । अथ वीरैर्जितामुर्वीमखिलां प्रत्यपद्यथाः ॥ ७ ॥ महाराज! कुरुजांगल देश ही आपका पैतृक राज्य है, किंतु शेष सारी पृथ्वी उन वीर पाण्डवोंने ही जीती है, जिसे आप पा गये हैं ॥ ७ ॥ बाहुवीर्यार्जिता भूमिस्तव पार्थैर्निवेदिता । मयेदं कृतमित्येव मन्यसे राजसत्तम ॥ ८ ॥ नृपश्रेष्ठ! कुन्तीपुत्रोंने अपने बाहुबलसे जीतकर यह भूमि आपकी सेवामें समर्पित की है, परंतु आप उसे अपनी जीती मानते हैं ॥ ८ ॥ ग्रस्तान् गन्धर्वराजेन मज्जतो ह्यप्लवेऽम्भसि । आनिनाय पुनः पार्थः पुत्रांस्ते राजसत्तम ॥ ९ ॥ राजशिरोमणे! (घोषयात्राके समय) गन्धर्वराज चित्रसेनने आपके पुत्रोंको कैद कर लिया था। वे सब-के-सब बिना नावके पानीमें डूब रहे थे, उस समय उन्हें अर्जुन ही पुनः छुड़ाकर ले आये थे ॥ ९ ॥ कुमारवच्च स्मयसे द्यूते विनिकृतेषु यत् । पाण्डवेषु वने राजन् प्रव्रजत्सु पुनः पुनः ॥ १० ॥ राजन्! पाण्डवलोग जब द्यूतक्रीड़ामें छले गये और हारकर वनमें जाने लगे, उस समय आप बच्चोंकी तरह बार-बार मुसकराकर अपनी प्रसन्नता प्रकट कर रहे थे ॥ प्रवर्षतः शरव्रातानर्जुनस्य शितान् बहून् । अप्यर्णवा विशुष्येयुः किं पुनर्मांसयोनयः ॥ ११ ॥ जब अर्जुन असंख्य तीखे बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगेंगे, उस समय समुद्र भी सूख जा सकते हैं, फिर हाड़-मांसके शरीरोंसे पैदा हुए प्राणियोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ११ ॥ अस्यतां फाल्गुनः श्रेष्ठो गाण्डीवं धनुषां वरम् । केशवः सर्वभूतानामायुधानां सुदर्शनम् ॥ १२ ॥ वानरो रोचमानश्च केतुः केतुमतां वरः । बाण चलानेवाले वीरोंमें अर्जुन श्रेष्ठ हैं, धनुषोंमें गाण्डीव उत्तम है, समस्त प्राणियोंमें भगवान् श्रीकृष्ण श्रेष्ठ हैं, आयुधोंमें सुदर्शन चक्र श्रेष्ठ है और पताकावाले ध्वजोंमें वानरसे उपलक्षित ध्वज ही श्रेष्ठ एवं प्रकाशमान है ॥ १२½ ॥ एवमेतानि स रथे वहञ्श्वेतहयो रणे ॥ १३ ॥ क्षपयिष्यति नो राजन् कालचक्रमिवोद्यतम् ।