भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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एकषष्टितमोऽध्यायः

दुर्योधनद्वारा आत्मप्रशंसा

वैशम्पायन उवाच

पितुरेतद् वचः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ।
आधाय विपुलं क्रोधं पुनरेवेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पिताकी यह बात सुनकर अत्यन्त असहिष्णु दुर्योधनने भीतर-ही-भीतर भारी क्रोध करके पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

अशक्या देवसचिवाः पार्थाः स्युरिति यद् भवान् ।
मन्यते तद् भयं व्येतु भवतो राजसत्तम ॥ २ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! आप जो ऐसा मानते हैं कि कुन्तीके पुत्रोंको जीतना असम्भव है, क्योंकि देवता उनके सहायक हैं, यह ठीक नहीं है। आपके मनसे यह भय निकल जाना चाहिये ॥ २ ॥

अकामद्वेषसंयोगलोभद्रोहाच्च भारत ।
उपेक्ष्या च भावानां देवा देवत्वमाप्नुवन् ॥ ३ ॥
‘भरतनन्दन! काम (राग), द्वेष, संयोग (ममता), लोभ और द्रोह (क्रोध)-रूपी दोषोंसे रहित होनेके कारण तथा दूषित भावोंकी उपेक्षा कर देनेके कारण ही देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है ॥ ३ ॥

इति द्वैपायनो व्यासो नारदश्च महातपाः ।
जामदग्न्यश्च रामो नः कथामकथयत् पुरा ॥ ४ ॥
‘यह बात पूर्वकालमें द्वैपायन व्यासजी, महातपस्वी नारदजी तथा जमदग्निनन्दन परशुरामजीने हमलोगोंको बतायी थी ॥ ४ ॥

नैव मानुषवद् देवाः प्रवर्तन्ते कदाचन ।
कामात् क्रोधात् तथा लोभाद् द्वेषाच्च भरतर्षभ ॥ ५ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! देवता मनुष्योंकी भाँति काम, क्रोध, लोभ और द्वेषभावसे किसी कार्यमें प्रवृत्त नहीं होते हैं ॥

यदा ह्यग्निश्च वायुश्च धर्म इन्द्रोऽश्विनावपि ।
कामयोगात् प्रवर्तेरन् न पार्था दुःखमाप्नुयुः ॥ ६ ॥
‘यदि अग्नि, वायु, धर्म, इन्द्र तथा दोनों अश्विनी-कुमार भी कामनाके वशीभूत होकर सब कार्योंमें प्रवृत्त होने लग जाते, तब तो कुन्तीपुत्रोंको कभी दुःख उठाना ही नहीं पड़ता ॥ ६ ॥

तस्मान्न भवता चिन्ता कार्यैषा स्यात् कथंचन ।