महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 504, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें'मैंने अपने पुरुषार्थ तथा सेवा-शुश्रूषासे उनके मनको प्रसन्न कर लिया था। वह ब्रह्मास्त्र अब भी मेरे पास है। मेरी आयु भी अभी शेष है; अतः मैं पाण्डवोंको जीतनेमें समर्थ हूँ। यह सारा भार मुझपर छोड़ दिया जाय ।। ४ ।।
निमेषमात्रात् तदृषेः प्रसाद- मवाप्य पाञ्चालकरूषमत्स्यान् । निहत्य पार्थान् सह पुत्रपौत्रै- र्लोकानहं शस्त्रजितान् प्रपत्स्ये ॥ ५ ॥
'महर्षि परशुरामका कृपाप्रसाद पाकर मैं पलक मारते-मारते पांचाल, करूष तथा मत्स्यदेशीय योद्धाओं और कुन्तीकुमारोंको पुत्र-पौत्रोंसहित मारकर शस्त्रद्वारा जीते हुए पुण्यलोकोंमें जाऊँगा ।। ५ ।।
पितामहस्तिष्ठतु ते समीपे द्रोणश्च सर्वे च नरेन्द्रमुख्याः । यथा प्रधानेन बलेन गत्वा पार्थान् हनिष्यामि ममैष भारः ॥ ६ ॥
'पितामह भीष्म आपके ही पास रहें, आचार्य द्रोण तथा समस्त मुख्य-मुख्य भूपाल भी आपके ही समीप रहें। मैं अपनी प्रधान सेनाके साथ जाकर अकेले ही सब कुन्तीकुमारोंको मार डालूँगा। इसका सारा भार मुझपर रहा' ।। ६ ।।
एवं ब्रुवन्तं तमुवाच भीष्मः किं कत्थसे कालपरीतबुद्धे । न कर्ण जानासि यथा प्रधाने हते हताः स्युर्धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ ७ ॥
कर्णको ऐसी बातें करते देख भीष्मजीने उससे कहा—'कर्ण! क्यों अपनी वीरताकी डींग हाँक रहा है? जान पड़ता है, कालने तेरी बुद्धिको ग्रस लिया है। क्या तू नहीं जानता कि युद्धमें तुझ प्रधान वीरके मारे जानेपर सारे धृतराष्ट्रपुत्र ही मृतप्राय हो जायँगे ।। ७ ।।
यत् खाण्डवं दाहयता कृतं हि कृष्णद्वितीयेन धनंजयेन । श्रुत्वैव तत् कर्म नियन्तुमात्मा युक्तस्त्वया वै सहबान्धवेन ॥ ८ ॥
'श्रीकृष्णसहित अर्जुनने खाण्डववनका दाह करते समय जो पराक्रम किया था, उसे सुनकर ही बान्धवों-सहित तुझे अपने मनपर काबू रखना उचित था ।। ८ ।।
यां चापि शक्तिं त्रिदशाधिपस्ते ददौ महात्मा भगवान् महेन्द्रः । भस्मीकृतां तां समरे विशीर्णां