भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 550

उत्सादयति यः सर्वं यशसा स विमुच्यते ।। ६१ ।। अकीर्तिं सर्वभूतेषु शाश्वतीं सोऽधिगच्छति । जो शत्रुके कुलमें आबालवृद्ध सभी पुरुषोंका उच्छेद कर डालता है, वह वीरोचित यशसे वंचित हो जाता है। वह समस्त प्राणियोंमें सदा बनी रहनेवाली अपकीर्ति (निन्दा)-का भागी होता है ।। ६१ १/२ ।।

न हि वैराणि शाम्यन्ति दीर्घकालधृतान्यपि ।। ६२ ।। आख्यातारश्च विद्यन्ते पुमांश्चेद् विद्यते कुले । दीर्घकालतक मनमें दबाये रखनेपर भी वैरकी आग सर्वथा बुझ नहीं पाती; क्योंकि यदि कोई उस कुलमें विद्यमान है, तो उससे पूर्वघटित वैर बढ़ानेवाली घटनाओंको बतानेवाले बहुत-से लोग मिल जाते हैं ।।

न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति ।। ६३ ।। हविषाग्निर्यथा कृष्ण भूय एवाभिवर्धते । केशव! जैसे घी डालनेपर आग बुझनेके बजाय और अधिक प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वैर करनेसे वैरकी आग शान्त नहीं होती, अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है ।। ६३ १/२ ।।

अतोऽन्यथा नास्ति शान्तिर्नित्यमन्तरमन्ततः ।। ६४ ।। अन्तरं लिप्समानानामयं दोषो निरन्तरः । (क्योंकि दोनों पक्षोंमें सदा कोई-न-कोई छिद्र मिलनेकी सम्भावना रहती है) इसलिये दोनों पक्षोंमेंसे एकका सर्वथा नाश हुए बिना पूर्णतः शान्ति नहीं प्राप्त होती है। जो लोग छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, उनके सामने यह दोष निरन्तर प्रस्तुत रहता है ।। ६४ १/२ ।।

पौरुषे यो हि बलवानाधिर्हृदयबाधनः । तस्य त्यागेन वा शान्तिर्मरणेनापि वा भवेत् ।। ६५ ।। यदि अपनेमें पुरुषार्थ है, तो पूर्ववैरको याद करके जो हृदयको पीड़ा देनेवाली प्रबल चिन्ता सदा बनी रहती है, उसे वैराग्यपूर्वक त्याग देनेसे ही शान्ति मिल सकती है; अथवा मर जानेसे ही उस चिन्ताका निवारण हो सकता है ।।

अथवा मूलघातेन द्विषतां मधुसूदन । फलनिर्वृत्तिरिद्धा स्यात् तन्नृशंसतरं भवेत् ।। ६६ ।। अथवा शत्रुओंको समूल नष्ट कर देनेसे ही अभीष्ट फलकी सिद्धि हो सकती है। परंतु मधुसूदन! यह बड़ी क्रूरताका कार्य होगा ।। ६६ ।।

या तु त्यागेन शान्तिः स्यात् तदृते वध एव सः । संशयाच्च समुच्छेदाद् द्विषतामात्मनस्तथा ।। ६७ ।। राज्यको त्याग देनेसे उसके बिना जो शान्ति मिलती है, वह भी वधके ही समान है। क्योंकि उस दशामें शत्रुओंसे सदा यह संदेह बना रहता है कि ये अवसर देखकर प्रहार करेंगे

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