भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 597, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 597

'यदि मैं दुःशासनकी साँवली भुजाको कटकर धूलमें लोटती न देखूँ तो मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? ।। त्रयोदश हि वर्षाणि प्रतीक्षन्त्या गतानि मे । विधाय हृदये मन्युं प्रदीप्तमिव पावकम् ।। ४० ।। 'प्रज्वलित अग्निके समान इस प्रचण्ड क्रोधको हृदयमें रखकर प्रतीक्षा करते मुझे तेरह वर्ष बीत गये हैं ।। विदीर्यते मे हृदयं भीमवाक्छल्यपीडितम् । योऽयमद्य महाबाहुर्धर्ममेवानुपश्यति ।। ४१ ।। 'आज भीमसेनके संधिके लिये कहे गये वचन मेरे हृदयमें बाणके समान लगे हैं, जिनसे पीड़ित होकर मेरा कलेजा फटा जा रहा है। हाय! ये महाबाहु आज (मेरे अपमानको भुलाकर) केवल धर्मका ही ध्यान धर रहे हैं ।। इत्युक्त्वा बाष्परुद्धेन कण्ठेनायतलोचना । रुरोद कृष्णा सोत्कम्पं सस्वरं बाष्पगद्गदम् ।। ४२ ।। स्तनौ पीनायतश्रोणी सहितावभिवर्षती । द्रवीभूतमिवात्युष्णं मुञ्चन्ती वारि नेत्रजम् ।। ४३ ।। इतना कहनेके बाद पीन एवं विशाल नितम्बोंवाली विशाललोचना द्रुपदकुमारी कृष्णाका कण्ठ आँसुओंसे रुँध गया। वह काँपती हुई अश्रुगद्गद वाणीमें फूट-फूटकर रोने लगी। उसके परस्पर सटे हुए स्तनोंपर नेत्रोंसे गरम-गरम आँसुओंकी वर्षा होने लगी; मानो वह अपने भीतरकी द्रवीभूत क्रोधाग्निको ही उन वाष्पबिन्दुओंके रूपमें बिखेर रही हो ।। ४२-४३ ।। तामुवाच महाबाहुः केशवः परिसान्त्वयन् । अचिराद् द्रक्ष्यसे कृष्णे रुदतीर्भरतस्त्रियः ।। ४४ ।। तब महाबाहु केशवने उसे सान्त्वना देते हुए कहा—'कृष्णे! तुम शीघ्र ही भरतवंशकी दूसरी स्त्रियोंको भी इसी प्रकार रुदन करते देखोगी ।। ४४ ।। एवं ता भीरु रोत्स्यन्ति निहतज्ञातिबान्धवाः । हतमित्रा हतबला येषां क्रुद्धासि भामिनि ।। ४५ ।। 'भामिनि! जिनपर तुम कुपित हुई हो, उन विपक्षियोंकी स्त्रियाँ भी अपने कुटुम्बी, बन्धु-बान्धव, मित्रवृन्द तथा सेनाओंके मारे जानेपर इसी तरह रोयेंगी ।। अहं च तत् करिष्यामि भीमार्जुनयमैः सह । युधिष्ठिरनियोगेन दैवाच्च विधिनिर्मितात् ।। ४६ ।। 'महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञा तथा विधाताके रचे हुए अदृष्टसे प्रेरित हो भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवको साथ लेकर मैं भी वही करूँगा, जो तुम्हें अभीष्ट है ।। धार्तराष्ट्राः कालपक्वा न चेच्छृण्वन्ति मे वचः ।

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