महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 600, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैत्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते मृद्वर्चिषि दिवाकरे ॥ ६ ॥ कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे । स्फीतसस्यसुखे काले कल्पः सत्त्ववतां वरः ॥ ७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर जब रात्रिका अन्धकार दूर हुआ और निर्मल आकाशमें सूर्यदेवके उदित होनेपर उनकी कोमल किरणें सब ओर फैल गयीं। कार्तिक मासके रेवती नक्षत्रमें 'मैत्र' नामक मुहूर्त उपस्थित होनेपर सत्त्वगुणी पुरुषोंमें श्रेष्ठ एवं समर्थ श्रीकृष्णने यात्रा आरम्भ की। उन दिनों शरद्-ऋतुका अन्त और हेमन्तका आरम्भ हो रहा था। सब ओर खूब उपजी हुई खेती लहलहा रही थी ॥
मङ्गल्याः पुण्यनिर्घोषा वाचः शृण्वंश्च सूनृताः । ब्राह्मणानां प्रतीतानामृषीणामिव वासवः ॥ ८ ॥ कृत्वा पौर्वाहिकं कृत्यं स्नातः शुचिरलंकृतः । उपतस्थे विवस्वन्तं पावकं च जनार्दनः ॥ ९ ॥ ऋषभं पृष्ठ आलभ्य ब्राह्मणानभिवाद्य च । अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा पश्यन् कल्याणमग्रतः ॥ १० ॥ तत् प्रतिज्ञाय वचनं पाण्डवस्य जनार्दनः । शिनेर्नप्तारमासीनमभ्यभाषत सात्यकिम् ॥ ११ ॥ भगवान् जनार्दनने सबसे पहले प्रातःकाल ऋषियोंके मुखसे मंगलपाठ सुननेवाले देवराज इन्द्रकी भाँति विश्वस्त ब्राह्मणोंके मुखसे परम मधुर मंगलकारक पुण्याहवाचन सुनते हुए स्नान किया। फिर उन्होंने पवित्र तथा वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सन्ध्यावन्दन, सूर्योपस्थान एवं अग्निहोत्र आदि पूर्वाह्निकृत्य सम्पन्न किये। इसके बाद बैलकी पीठ छूकर ब्राह्मणोंको नमस्कार किया और अग्निकी परिक्रमा करके अपने सामने प्रस्तुत की हुई कल्याणकारक वस्तुओंका दर्शन किया। तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी बातोंपर विचार करके जनार्दनने अपने पास बैठे हुए शिनिपौत्र सात्यकिसे इस प्रकार कहा— ॥ ८—११ ॥
रथ आरोप्यतां शङ्खश्चक्रं च गदया सह । उपासंगाश्च शक्त्यश्च सर्वप्रहरणानि च ॥ १२ ॥ ‘युयुधान! मेरे रथपर शंख, चक्र, गदा, तूणीर, शक्ति तथा अन्य सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लाकर रख दो ॥
दुर्योधनश्च दुष्टात्मा कर्णश्च सहसौबलः । न च शत्रुरवज्ञेयो दुर्बलोऽपि बलीयसा ॥ १३ ॥ ‘कोई अत्यन्त बलवान् क्यों न हो; उसे अपने दुर्बल शत्रुकि भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; (उससे सतर्क रहना चाहिये।) फिर दुर्योधन, कर्ण और शकुनि तो दुष्टात्मा ही हैं। उनसे तो सावधान रहनेकी अत्यन्त आवश्यकता है ॥ १३ ॥