महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 618, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘उन नरश्रेष्ठ श्रीकृष्णका यहाँ सम्मान होना चाहिये; क्योंकि वे सनातन धर्मस्वरूप हैं। सम्मानित होनेपर वे हमारे लिये सुखदायक होंगे और सम्मानित न होनेपर हमारे दुःखके कारण बन जायँगे॥ ७॥ स चेत् तुष्यति दाशार्ह उपचारैररिंदमः। कृष्णात् सर्वानभिप्रायन् प्राप्स्यामः सर्वराजसु॥ ८॥ ‘शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण यदि हमारे सत्कार-साधनोंसे संतुष्ट हो जायँगे, तब हम समस्त राजाओंमें उनसे अपने सारे मनोरथ प्राप्त कर लेंगे॥ ८॥ तस्य पूजार्थमद्यैव संविधत्स्व परंतप। सभाः पथि विधीयन्तां सर्वकामसमन्विताः॥ ९॥ ‘परंतप! तुम श्रीकृष्णके स्वागत-सत्कारके लिये आजसे ही तैयारी करो। मार्गमें अनेक विश्रामस्थान बनवाओ और उनमें सब प्रकारकी मनोनुकूल उपभोग-सामग्री प्रस्तुत करो॥ ९॥ यथा प्रीतिर्महाबाहो त्वयि जायेत तस्य वै। तथा कुरुष्व गान्धारे कथं वा भीष्म मन्यसे॥ १०॥ ‘महाबाहु गान्धारीनन्दन! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे श्रीकृष्णके हृदयमें तुम्हारे प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाय। अथवा भीष्मजी! इस विषयमें आपकी क्या सम्मति है?’॥ १०॥ ततो भीष्मादयः सर्वे धृतराष्ट्रं जनाधिपम्। ऊचुः परममित्येवं पूजयन्तोऽस्य तद् वचः॥ ११॥ तब भीष्म आदि सब लोगोंने उस प्रस्तावकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए राजा धृतराष्ट्रसे कहा—‘बहुत उत्तम बात है’॥ ११॥ तेषामनुमतं ज्ञात्वा राजा दुर्योधनस्तदा। सभावास्तूनि रम्याणि प्रदेष्टुमुपचक्रमे॥ १२॥ उन सबकी अनुमति जानकर राजा दुर्योधनने उस समय जगह-जगह सुन्दर सभामण्डप तथा विश्रामस्थान बनवानेके लिये आदेश जारी किया॥ १२॥ ततो देशेषु देशेषु रमणीयेषु भागशः। सर्वरत्नसमाकीर्णाः सभाश्चक्रुरनेकशः॥ १३॥ तब कारीगरोंने विभिन्न रमणीय प्रदेशोंमें अलग-अलग सब प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न अनेक विश्राम-स्थान बनाये॥ १३॥ आसनानि विचित्राणि युतानि विविधैर्गुणैः। स्त्रियो गन्धानलंकारान् सूक्ष्माणि वसनानि च॥ १४॥ गुणवन्त्यन्नपानानि भोज्यानि विविधानि च। माल्यानि च सुगन्धीनि तानि राजा ददौ ततः॥ १५॥