महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 640, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्यक्त्वा प्रियसुखे पार्था रुदतीमपहाय माम् ॥ ६ ॥ ‘मेरे बेटे हर्ष और क्रोधको जीत चुके थे। वे ब्राह्मणोंका हित-साधन करनेवाले तथा सत्यवादी थे; तथापि (शत्रुओंके अन्यायसे विवश हो) प्रियजन एवं सुखभोगसे मुँह मोड़ मुझे रोती-बिलखती छोड़कर वे वनकी ओर चल दिये॥ ६॥ अहार्षुश्च वनं यान्तः समूलं हृदयं मम । अतदर्हा महात्मानः कथं केशव पाण्डवाः ॥ ७ ॥ ‘केशव! वन जाते समय महात्मा पाण्डव मेरे हृदयको जड़-मूलसहित खींचकर अपने साथ ले गये। वे वनवासके योग्य कदापि नहीं थे। फिर उन्हें यह कष्ट कैसे प्राप्त हुआ?॥ ७॥ ऊषुर्महावने तात सिंहव्याघ्रगजाकुले । बाला विहीनाः पित्रा ते मया सततलालिताः ॥ ८ ॥ अपश्यन्तश्च पितरौ कथमूषुर्महावने । ‘तात! वे बचपनमें ही पिताके प्यारसे वंचित हो गये थे। मैंने ही सदा उनका लालन-पालन किया। मेरे पुत्र सिंह, व्याघ्र और हाथियोंसे भरे हुए उस विशाल वनमें कैसे रहे होंगे? माता-पिताको न देखते हुए उन्होंने उस महान् वनमें किस प्रकार निवास किया होगा? ॥ शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्मृदङ्गैर्वेणुनिस्वनैः ॥ ९ ॥ पाण्डवाः समबोध्यन्त बाल्यात् प्रभृति केशव । ‘केशव! बाल्यावस्थासे ही पाण्डव शंख और दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिसे, मृदंगोंके मधुर नादसे तथा बाँसुरीकी सुरीली तानसे जगाये जाते थे ॥ ९ १/२ ॥ ये स्म वारणशब्देन हयानां हेषितेन च ॥ १० ॥ रथनेमिनिनादैश्च व्यबोध्यन्त तदा गृहे । शङ्खभेरीनिनादेन वेणुवीणानुनादिना ॥ ११ ॥ पुण्याहघोषमिश्रेण पूज्यमाना द्विजातिभिः । वस्त्रै रत्नैरलङ्कारैः पूजयन्तो द्विजन्मनः ॥ १२ ॥ गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिर्ब्राह्मणानां महात्मनाम् । अर्चितैरर्चनाहैंश्च स्तुवद्भिरभिनन्दिताः ॥ १३ ॥ प्रासादाग्रेष्वबोध्यन्त राङ्कवाजिनशायिनः । क्रूरं च निनदं श्रुत्वा श्वापदानां महावने ॥ १४ ॥ न स्मोपयान्ति निद्रां ते न तदर्हा जनार्दन ।