भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 682, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 682

एकासने महात्मानौ निषीदतुरुमर्षणौ । अमर्षमें भरे हुए महामना कर्ण और दुर्योधन दोनों एक आसनपर श्रीकृष्णके पास ही बैठे थे ॥ ४८ १/२ ॥ गान्धारराजः शकुनिर्-गान्धारैरभिरक्षितः ॥ ४९ ॥ निषसादासने राजा सहपुत्रो विशाम्पते । जनमेजय! गान्धारदेशीय सैनिकोंसे सुरक्षित पुत्रसहित गान्धारराज शकुनि भी एक आसनपर बैठा था ॥ ४९ १/२ ॥ विदुरो मणिपीठे तु शुक्लस्पर्ध्याजिनोत्तरे ॥ ५० ॥ संस्पृशन्नासनं शौरेर्महामतिरुपाविशत् । परम बुद्धिमान् विदुर भगवान् श्रीकृष्णके आसनका स्पर्श करते हुए एक मणिमय चौकीपर, जिसके ऊपर श्वेत रंगका स्पृहणीय मृगचर्म बिछाया गया था, बैठे थे ॥ ५० १/२ ॥ चिरस्य दृष्ट्वा दाशार्हं राजानः सर्व एव ते ॥ ५१ ॥ अमृतस्येव नातृप्यन् प्रेक्षमाणा जनार्दनम् । सब राजा दीर्घकालके पश्चात् दशार्हकुलभूषण भगवान् जनार्दनको देखकर उन्हींकी ओर एकटक दृष्टि लगाये रहे, मानो अमृत पी रहे हों। इस प्रकार उन्हें तृप्ति ही नहीं होती थी ॥ ५१ १/२ ॥ अतसीपुष्पसंकाशः पीतवासा जनार्दनः ॥ ५२ ॥ व्यभ्राजत सभामध्ये हेम्नीवोपहितो मणिः ॥ ५३ ॥ अलसीके फूलकी भाँति मनोहर श्याम कान्तिवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण उस सभाके मध्यभागमें स्वर्ण-पात्रमें रखी हुई नीलमणिके समान शोभा पा रहे थे ॥ ततस्तूष्णीं सर्वमासीद् गोविन्दगतमानसम् । न तत्र कश्चित् किञ्चिद् वा व्याजहार पुमान् क्वचित् ॥ ५४ ॥ उस समय वहाँ सबका मन भगवान् गोविन्दमें ही लगा हुआ था। अतः सभी चुपचाप बैठे थे। कोई मनुष्य कहीं कुछ भी बोल नहीं रहा था ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णसभाप्रवेशे चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका सभामें प्रवेशविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० १/२ श्लोक मिलाकर कुल ६४ १/२ श्लोक हैं।]