भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 686, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 686

राजेन्द्र! आपके पुत्रोंको चाहिये कि वे अपने अनुयायियोंके साथ आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करें। आपके शासनमें रहनेसे ही इनका महान् हित हो सकता है ॥ १४ ॥ तव चैव हितं राजन् पाण्डवानामथो हितम् । शमे प्रयतमानस्य तव शासनकाङ्क्षिणः ॥ १५ ॥ राजन्! यदि आप अपने पुत्रोंपर शासन करना चाहें और संधिके लिये प्रयत्न करें तो इसीमें आपका भी हित है और इसीसे पाण्डवोंका भी भला हो सकता है ॥ १५ ॥ स्वयं निष्फलमालक्ष्य संविधत्स्व विशाम्पते । सहायभूता भरतास्तवैवं स्युर्जनेश्वर ॥ १६ ॥ प्रजानाथ! पाण्डवोंके साथ वैर और विवादका कोई अच्छा परिणाम नहीं हो सकता; यह विचारकर आप स्वयं ही संधिके लिये प्रयत्न करें। जनेश्वर! ऐसा करनेसे भरतवंशी पाण्डव आपके ही सहायक होंगे ॥ १६ ॥ धर्मार्थयोस्तिष्ठ राजन् पाण्डवैरभिरक्षितः । न हि शक्यास्तथाभूता यत्नादपि नराधिप ॥ १७ ॥ राजन्! आप पाण्डवोंसे सुरक्षित होकर धर्म और अर्थका अनुष्ठान कीजिये। नरेन्द्र! आपको पाण्डवोंके समान संरक्षक प्रयत्न करनेपर भी नहीं मिल सकते ॥ १७ ॥ न हि त्वां पाण्डवैर्जेतुं रक्ष्यमाणं महात्मभिः । इन्द्रोऽपि देवैः सहितः प्रसहेत कुतो नृपः ॥ १८ ॥ महात्मा पाण्डवोंसे सुरक्षित होनेपर आपको देवताओंसहित इन्द्र भी नहीं जीत सकते, फिर दूसरे किसी राजाकी तो बात ही क्या है? ॥ १८ ॥ यत्र भीष्मश्च द्रोणश्च कृपः कर्णो विविंशतिः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः ॥ १९ ॥ सैन्धवश्च कलिङ्गश्च काम्बोजश्च सुदक्षिणः । युधिष्ठिरो भीमसेनः सव्यसाची यमौ तथा ॥ २० ॥ सात्यकिश्च महातेजा युयुत्सुश्च महारथः । को नु तान् विपरीतात्मा युद्धयेत भरतर्षभ ॥ २१ ॥ भरतश्रेष्ठ! जिस पक्षमें भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, विविंशति, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्लिक, सिन्धुराज जयद्रथ, कलिंगराज, काम्बोजनरेश सुदक्षिण तथा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, महातेजस्वी सात्यकि तथा महारथी युयुत्सु हों; उस पक्षके योद्धाओंसे कौन विपरीत बुद्धिवाला राजा युद्ध कर सकता है? ॥ १९—२१ ॥ लोकस्येश्वरतां भूयः शत्रुभिश्चाप्यधृष्यताम् । प्राप्स्यसि त्वममित्रघ्न सहितः कुरुपाण्डवैः ॥ २२ ॥ शत्रुसूदन नरेश! कौरव और पाण्डवोंके साथ रहनेपर आप पुनः सम्पूर्ण जगत्के सम्राट् होकर शत्रुओंके लिये अजेय हो जायँगे ॥ २२ ॥