महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 724, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुछ नागोंके एक सहस्र सिर होते हैं, किन्हींके पाँच सौ, किन्हींके एक सौ और किन्हींके तीन ही सिर होते हैं ।। ६ ।। द्विपञ्चशिरसः केचित् केचित् सप्तमुखास्तथा । महाभोगा महाकायाः पर्वताभोगभोगिनः ।। ७ ।। कोई दो सिरवाले, कोई पाँच सिरवाले और कोई सात मुखवाले होते हैं। किन्हींके बड़े-बड़े फन, किन्हींके दीर्घ शरीर और किन्हींके पर्वतके समान स्थूल शरीर होते हैं ।। बहूनीह सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । नागानामेकवंशानां यथाश्रेष्ठं तु मे शृणु ।। ८ ।। यहाँ एक-एक वंशके नागोंकी कई हजार, कई लाख तथा कई अर्बुद संख्या है। मैं जेठे-छोटेके क्रमसे इनका संक्षिप्त परिचय देता हूँ, सुनो ।। ८ ।। वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनंजयौ । कालियो नहुषश्चैव कम्बलाश्वतरावुभौ ।। ९ ।। बाह्यकुण्डो मणिनागस्तथैवापूरणः खगः । वामनश्चैलपत्रश्च कुकुरः कुकुणस्तथा ।। १० ।। आर्यको नन्दकश्चैव तथा कलशपोतकौ । कैलासकः पिञ्जरको नागश्चैरावतस्तथा ।। ११ ।। सुमनोमुखो दधिमुखः शङ्खो नन्दोपनन्दकौ । आप्तः कोटरकश्चैव शिखी निष्ठुरिकस्तथा ।। १२ ।। तित्तिरिर्हस्तिभद्रश्च कुमुदो माल्यपिण्डकः । द्वौ पद्मौ पुण्डरीकश्च पुष्पो मुद्गरपर्णकः ।। १३ ।। करवीरः पीठरकः संवृत्तो वृत्त एव च । पिण्डारो बिल्वपत्रश्च मूषिकादः शिरीषकः ।। १४ ।। दिलीपः शङ्खशीर्षश्च ज्योतिष्कोऽथापराजितः । कौरव्यो धृतराष्ट्रश्च कुहरः कृशकस्तथा ।। १५ ।। विरजा धारणश्चैव सुबाहुर्मुखरो जयः । बधिरान्धौ विशुण्डिश्च विरसः सुरसस्तथा ।। १६ ।। एते चान्ये च बहवः कश्यपस्यात्मजाः स्मृताः । मातले पश्य यद्यत्र कश्चित् ते रोचते वरः ।। १७ ।। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, नहुष, कम्बल, अश्वतर, बाह्यकुण्ड, मणिनाग, आपूरण, खग, वामन, एलपत्र, कुकुर, कुकुण, आर्यक, नन्दक, कलश, पोतक, कैलासक, पिंजरक, ऐरावत, सुमनोमुख, दधिमुख, शंख, नन्द, उपनन्द, आप्त, कोटरक, शिखी, निष्ठुरिक, तित्तिरि, हस्तिभद्र, कुमुद, माल्यपिण्डक, पद्मनामक दो नाग, पुण्डरीक, पुष्प, मुद्गरपर्णक, करवीर, पीठरक, संवृत्त, वृत्त, पिण्डार, बिल्वपत्र, मूषिकाद, शिरीषक,