महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनारदजी बोले—मातले! यह नागराज सुमुख है, जो ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुआ है। यह आर्यकका पौत्र और वामनका दौहित्र है ।। २३ ।।
एतस्य हि पिता नागश्चिकुरो नाम मातले ।
नचिराद् वैनतेयेन पञ्चत्वमुपपादितः ॥ २४ ॥
सूत! इसके पिता नागराज चिकुर थे, जिन्हें थोड़े ही दिन पहले गरुड़ने अपना ग्रास बना लिया है ।। २४ ।।
ततोऽब्रवीत् प्रीतमना मातलिर्नारदं वचः ।
एष मे रुचितस्तात जामाता भुजगोत्तमः ॥ २५ ॥
तब मातलिने प्रसन्नचित्त होकर नारदजीसे कहा—'तात! यह श्रेष्ठ नाग मुझे अपना जामाता बनानेके योग्य जँच गया ।। २५ ।।
क्रियतामत्र यत्नो वै प्रीतिमानस्म्यनेन वै ।
अस्मै नागाय वै दातुं प्रियां दुहितरं मुने ॥ २६ ॥
'मैं इससे बहुत प्रसन्न हूँ। आप इसीके लिये यत्न कीजिये। मुने! मैं इसी नागको अपनी प्यारी पुत्री देना चाहता हूँ' ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०३ ।।