महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाधिकशततमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना
कण्व उवाच
गरुडस्तत्र शुश्राव यथावृत्तं महाबलः।
आयुःप्रदानं शक्रेण कृतं नागस्य भारत॥ १॥
कण्व मुनि कहते हैं— भारत! महाबली गरुड़ने यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुना कि इन्द्रने सुमुख नागको दीर्घायु प्रदान की है॥ १॥
पक्षवातेन महता रुद्ध्वा त्रिभुवनं खगः।
सुपर्णः परमक्रुद्धो वासवं समुपाद्रवत्॥ २॥
यह सुनते ही आकाशचारी गरुड़ अत्यन्त क्रुद्ध हो अपने पंखोंकी प्रचण्ड वायुसे तीनों लोकोंको कम्पित करते हुए इन्द्रके समीप दौड़े आये॥ २॥
गरुड उवाच
भगवन् किमवज्ञानाद् वृत्तिः प्रतिहता मम।
कामकारवरं दत्त्वा पुनश्चलितवानसि॥ ३॥
गरुड बोले— भगवन्! आपने अवहेलना करके मेरी जीविकामें क्यों बाधा पहुँचायी है? एक बार मुझे इच्छानुसार कार्य करनेका वरदान देकर अब फिर उससे विचलित क्यों हुए हैं? ॥ ३॥
निसर्गात् सर्वभूतानां सर्वभूतेश्वरेण मे।
आहारो विहितो धात्रा किमर्थं वार्यते त्वया॥ ४॥
समस्त प्राणियोंके स्वामी विधाताने सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि करते समय मेरा आहार निश्चित कर दिया था। फिर आप किसलिये उसमें बाधा उपस्थित करते हैं? ॥ ४॥
वृतश्चैष महानागः स्थापितः समयश्च मे।
अनेन च मया देव भर्त्तव्यः प्रसवो महान्॥ ५॥
देव! मैंने उस महानागको अपने भोजनके लिये चुन लिया था। इसके लिये समय भी निश्चित कर दिया था और उसीके द्वारा मुझे अपने विशाल परिवारका भरण-पोषण करना था॥ ५॥
एतस्मिंस्तु तथाभूते नान्यं हिंसितुमुत्सहे।
क्रीडसे कामकारेण देवराज यथेच्छकम्॥ ६॥