महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवन धारण करनेसे क्या सुख होगा? ॥ ६ ॥ सुहृदां हि धनं भुक्त्वा कृत्वा प्रणयमीप्सितम् । प्रतिकर्तुमशक्तस्य जीवितान्मरणं वरम् ॥ ७ ॥ ‘जो इच्छानुसार प्रेम-सम्बन्ध स्थापित करके सुहृदोंका धन भोगकर उनका प्रत्युपकार करनेमें असमर्थ हो, उसके जीनेसे मर जाना ही अच्छा है ॥ ७ ॥ प्रतिश्रुत्य करिष्येति कर्तव्यं तदकुर्वतः । मिथ्यावचनदग्धस्य इष्टापूर्तं प्रणश्यति ॥ ८ ॥ ‘जो ‘करूँगा' ऐसा कहकर किसी कार्यको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ले, परंतु आगे चलकर उस कर्तव्यका पालन न कर सके, उस असत्यभाषणसे दग्ध हुए पुरुषके ‘इष्ट' और ‘आपूर्त' सभी नष्ट हो जाते हैं ॥ ८ ॥ न रूपमनृतस्यास्ति नानृतस्यास्ति संततिः । नानृतस्याधिपत्यं च कुत एव गतिः शुभा ॥ ९ ॥ ‘सत्यसे शून्य मनुष्यका जीवन नहींके बराबर है। मिथ्यावादीको संतति नहीं प्राप्त होती। झूठेको प्रभुत्व नहीं मिलता, फिर उसे शुभ गति कैसे प्राप्त हो सकती है? ॥ ९ ॥ कुतः कृतघ्नस्य यशः कुतः स्थानं कुतः सुखम् । अश्रद्धेयः कृतघ्नो हि कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥ १० ॥ ‘कृतघ्न मनुष्यको सुयश कहाँ? स्थान या प्रतिष्ठा कहाँ और सुख भी कहाँ? कृतघ्न मानव अविश्वसनीय होता है, उसका कभी उद्धार नहीं होता है ॥ १० ॥ न जीवत्यधनः पापः कुतः पापस्य तन्त्रणम् । पापो ध्रुवमवाप्नोति विनाशं नाशयन् कृतम् ॥ ११ ॥ ‘निर्धन एवं पापी मनुष्यका जीवन वास्तवमें जीवन नहीं है। पापी मनुष्य अपने कुटुम्बका पोषण भी कैसे कर सकता है? पापात्मा (निर्धन) पुरुष अपने पुण्य कर्मोंका नाश करता हुआ स्वयं भी निश्चय ही नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥ सोऽहं पापः कृतघ्नश्च कृपणश्चानृतोऽपि च । गुरोरर्थः कृतकार्यः संस्तत् करोमि न भाषितम् ॥ १२ ॥ ‘मैं पापी, कृतघ्न, कृपण और मिथ्यावादी हूँ, जिसने गुरुसे तो अपना काम करा लिया, परंतु स्वयं जो उन्हें देनेकी प्रतिज्ञा की है, उसकी पूर्ति नहीं कर पा रहा हूँ ॥ १२ ॥ सोऽहं प्राणान् विमोक्ष्यामि कृत्वा यत्नमनुत्तमम् । अर्थिता न मया काचित् कृतपूर्वा दिवौकसाम् । मानयन्ति च मां सर्वे त्रिदशा यज्ञसंस्तरे ॥ १३ ॥ ‘अतः मैं कोई उत्तम प्रयत्न करके अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा। मैंने आजसे पहले देवताओंसे भी कभी कोई याचना नहीं की है। सब देवता यज्ञमें मेरा समादर करते हैं ॥ १३ ॥