भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 751

अत्र गत्वा सुखस्यान्तं दुःखस्यान्तं प्रपद्यते । अत्रावृत्तो दिनकरः सुरसं क्षरते पयः ॥ १५ ॥ काष्ठां चासाद्य वासिष्ठीं हिममुत्सृजते पुनः । मनुष्य इसी दिशामें जाकर सुख और दुःखके अन्तको प्राप्त होता है। इसी दक्षिण दिशामें लौटनेपर (अर्थात् उत्तरायणके अन्तिम भागमें पहुँचकर दक्षिणायनके आरम्भमें आनेपर जब कि वर्षा ऋतु रहती है,) सूर्यदेव सुस्वादु जलकी वर्षा करते हैं। फिर वसिष्ठ मुनिके द्वारा सेवित उत्तर दिशामें पहुँचकर (अर्थात् उत्तरायणके प्रारम्भमें जब कि शिशिर ऋतु रहती है,) वे ओले गिराते हैं॥ १५ १/२ ॥

अत्राहं गालव पुरा क्षुधार्तः परिचिन्तयन् ॥ १६ ॥ लब्धवान् युध्यमानौ द्वौ बृहन्तौ गजकच्छपौ । गालव! पूर्वकालकी बात है, मैं भूखसे पीड़ित होकर भारी चिन्तामें पड़ गया था, परंतु इसी दिशामें आनेपर दो विशाल प्राणी—हाथी और कछुआ मेरे हाथ लग गये, जो आपसमें लड़ रहे थे॥ १६ १/२ ॥

अत्र चक्रधनुर्नाम सूर्याज्जातो महानृषिः ॥ १७ ॥ विदुर्यं कपिलं देवं येनार्ताः सगरात्मजाः । सूर्यके समान तेजस्वी महर्षि कर्दमसे उत्पन्न हुए 'चक्रधनु' नामक महर्षि इसी दिशामें रहते थे, जिन्हें सब लोग 'कपिलदेव' के नामसे जानते हैं। उन्होंने ही सगरके पुत्रोंको भस्म कर दिया था॥ १७ १/२ ॥

अत्र सिद्धाः शिवा नाम ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥ १८ ॥ अधीत्य सकलान् वेदांल्लेभिरे मोक्षमक्षयम् । इसी दिशामें 'शिव' नामसे प्रसिद्ध कुछ सिद्ध ब्राह्मण रहते थे, जो वेदोंके पारंगत पण्डित थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके (तत्त्वज्ञानद्वारा) अक्षय मोक्ष प्राप्त कर लिया॥ १८ १/२ ॥

अत्र भोगवती नाम पुरी वासुकिपालिता ॥ १९ ॥ तक्षकेण च नागेन तथैवैरावतेन च । दक्षिणमें ही वासुकिद्वारा पालित तथा तक्षक एवं ऐरावत नागद्वारा सुरक्षित भोगवती नामक पुरी है॥

अत्र निर्याणकालेऽपि तमः सम्प्राप्यते महत् ॥ २० ॥ अभेद्यं भास्करेणापि स्वयं वा कृष्णवर्त्मना । मृत्युके पश्चात् इस दिशामें जानेवाले प्राणीको ऐसे घोर अन्धकारका सामना करना पड़ता है, जो साक्षात् अग्नि एवं सूर्यके लिये भी अभेद्य है॥ २० १/२ ॥

एष तस्यापि ते मार्गः परिचार्यस्य गालव । ब्रूहि मे यदि गन्तव्यं प्रतीचीं शृणु चापराम् ॥ २१ ॥