भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 789

भवतो ह्यनृणो भूत्वा तपः कुर्यां यथासुखम् ॥ १४ ॥ 'इस प्रकार आपके आठ सौ घोड़ोंकी संख्या पूरी हो जाय और मैं आपसे उऋण होकर सुखपूर्वक तपस्या करूँ, ऐसी कृपा कीजिये'। ॥ १४ ॥ विश्वामित्रस्तु तं दृष्ट्वा गालवं सह पक्षिणा । कन्यां च तां वरारोहामिदमित्यब्रवीद् वचः ॥ १५ ॥ विश्वामित्रने गरुड़सहित गालवकी ओर देखकर इस परम सुन्दरी कन्यापर भी दृष्टिपात किया और इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥ किमियं पूर्वमेवेह न दत्ता मम गालव । पुत्रा ममैव चत्वारो भवेयुः कुलभावनाः ॥ १६ ॥ 'गालव! तुमने पहले ही इसे यहीं क्यों नहीं दे दिया, जिससे मुझे ही वंशप्रवर्तक चार पुत्र प्राप्त हो जाते ॥ प्रतिगृह्णामि ते कन्यामेकपुत्रफलाय वै । अश्वाश्चाश्रममासाद्य चरन्तु मम सर्वशः ॥ १७ ॥ 'अच्छा, अब मैं एक पुत्ररूपी फलकी प्राप्तिके लिये तुमसे इस कन्याको ग्रहण करता हूँ। ये घोड़े मेरे आश्रममें आकर सब ओर चरें'। ॥ १७ ॥ स तया रममाणोऽथ विश्वामित्रो महाद्युतिः । आत्मजं जनयामास माधवीपुत्रमष्टकम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार महातेजस्वी विश्वामित्र मुनिने उसके साथ रमण करते हुए यथासमय उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया। माधवीके उस पुत्रका नाम अष्टक था ॥ १८ ॥ जातमात्रं सुतं तं च विश्वामित्रो महामुनिः । संयोज्यार्थैस्तथा धर्मैरश्वैस्तैः समयोजयत् ॥ १९ ॥ पुत्रके उत्पन्न होते ही महामुनि विश्वामित्रने उसे धर्म, अर्थ तथा उन अश्वोंसे सम्पन्न कर दिया ॥ १९ ॥ अथाष्टकः पुरं प्रायात् तदा सोमपुरप्रभम् । निर्यात्य कन्यां शिष्याय कौशिकोऽपि वनं ययौ ॥ २० ॥ तदनन्तर अष्टक चन्द्रपुरीके समान प्रकाशित होनेवाली विश्वामित्रजीकी राजधानीमें गया और विश्वामित्र भी अपने शिष्य गालवको वह कन्या लौटाकर वनमें चले गये ॥ गालवोऽपि सुपर्णेन सह निर्यात्य दक्षिणाम् । मनसातिप्रतीतेन कन्यामिदमुवाच ह ॥ २१ ॥ जातो दानपतिः पुत्रस्त्वया शूरस्तथापरः । सत्यधर्मरतश्चान्यो यज्वा चापि तथापरः ॥ २२ ॥ तदागच्छ वरारोहे तारितस्ते पिता सुतैः । चत्वारश्चैव राजानस्तथा चाहं सुमध्यमे ॥ २३ ॥

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