भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 856

और राक्षस भी उनके विभिन्न अंगोंमें प्रकट हो गये ॥ ६-७ ॥ प्रादुरास्तां तथा दोर्भ्यां संकर्षणधनंजयौ । दक्षिणेऽथार्जुनो धन्वी हली रामश्च सव्यतः ॥ ८ ॥ उनकी दोनों भुजाओंसे बलराम और अर्जुनका प्रादुर्भाव हुआ। दाहिनी भुजामें धनुर्धर अर्जुन और बायींमें हलधर बलराम विद्यमान थे ॥ ८ ॥ भीमो युधिष्ठिरश्चैव माद्रीपुत्रौ च पृष्ठतः । अन्धका वृष्णयश्चैव प्रद्युम्नप्रमुखास्ततः ॥ ९ ॥ अग्रे बभूवुः कृष्णस्य समुद्यतमहायुधाः । भीमसेन, युधिष्ठिर तथा माद्रीनन्दन नकुलसहदेव भगवान्‌के पृष्ठभागमें स्थित थे। प्रद्युम्न आदि वृष्णिवंशी तथा अन्धकवंशी योद्धा हाथोंमें विशाल आयुध धारण किये भगवान्‌के अग्रभागमें प्रकट हुए ॥ ९ १/२ ॥ शङ्खचक्रगदाशक्तिशार्ङ्‌गलाङ्गलन्दकाः ॥ १० ॥ अदृश्यन्तोद्यतान्येव सर्वप्रहरणानि च । नानाबाहुषु कृष्णस्य दीप्यमानानि सर्वशः ॥ ११ ॥ शंख, चक्र, गदा, शक्ति, शार्ङ्गधनुष, हल तथा नन्दक नामक खड्ग—ये ऊपर उठे हुए ही समस्त आयुध श्रीकृष्णकी अनेक भुजाओंमें देदीप्यमान दिखायी देते थे ॥ १०-११ ॥ नेत्राभ्यां नस्ततश्चैव श्रोत्राभ्यां च समन्ततः । प्रादुरासन् महारौद्राः सधूमाः पावकार्चिषः ॥ १२ ॥ उनके नेत्रोंसे, नासिकाके छिद्रोंसे और दोनों कानोंसे सब ओर अत्यन्त भयंकर धूमयुक्त आगकी लपटें प्रकट हो रही थीं ॥ १२ ॥ रोमकूपेषु च तथा सूर्यस्येव मरीचयः । तं दृष्ट्वा घोरमात्मानं केशवस्य महात्मनः ॥ १३ ॥ न्यमीलयन्त नेत्राणि राजानस्त्रस्तचेतसः । ऋते द्रोणं च भीष्मं च विदुरं च महामतिम् ॥ १४ ॥ संजयं च महाभागमृषींश्चैव तपोधनान् । प्रादात् तेषां स भगवान् दिव्यं चक्षुर्जनार्दनः ॥ १५ ॥ समस्त रोमकूपोंसे सूर्यके समान दिव्य किरणें छिटक रही थीं। महात्मा श्रीकृष्णके उस भयंकर स्वरूपको देखकर समस्त राजाओंके मनमें भय समा गया और उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिये। द्रोणाचार्य, भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर, महाभाग संजय तथा तपस्याके धनी महर्षियोंको छोड़कर अन्य सब लोगोंकी आँखें बंद हो गयी थीं। इन द्रोण आदिको भगवान् जनार्दनने स्वयं ही दिव्य दृष्टि प्रदान की थी (अतः वे आँख खोलकर उन्हें देखनेमें समर्थ हो सके) ॥ १३—१५ ॥ तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं माधवस्य सभातले ।