भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 858

तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषसिंह श्रीकृष्णने अपने इस स्वरूपको, उस दिव्य, अद्भुत एवं विचित्र ऐश्वर्यको समेट लिया ॥ २३ ॥ ततः सात्यकिमादाय पाणौ हार्दिक्यमेव च । ऋषिभिस्तैरनुज्ञातो निर्ययौ मधुसूदनः ॥ २४ ॥ तत्पश्चात् वे मधुसूदन ऋषियोंसे आज्ञा ले सात्यकि और कृतवर्माका हाथ पकड़े सभाभवनसे चल दिये ॥ ऋषयोऽन्तर्हिता जग्मुस्ततस्ते नारदादयः । तस्मिन् कोलाहले वृत्ते तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २५ ॥ उनके जाते ही नारद आदि महर्षि भी अदृश्य हो गये। वह सारा कोलाहल शान्त हो गया। यह सब एक अद्भुत-सी घटना हुई थी ॥ २५ ॥ तं प्रस्थितमभिप्रेक्ष्य कौरवाः सह राजभिः । अनुजग्मुर्नरव्याघ्रं देवा इव शतक्रतुम् ॥ २६ ॥ पुरुषसिंह श्रीकृष्णको जाते देख राजाओंसहित समस्त कौरव भी उनके पीछे-पीछे गये, मानो देवता देवराज इन्द्रका अनुसरण कर रहे हों ॥ २६ ॥ अचिन्तयन्नमेयात्मा सर्वं तद् राजमण्डलम् । निश्चक्राम ततः शौरिः सधूम इव पावकः ॥ २७ ॥ परंतु अप्रमेयस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण उस समस्त नरेशमण्डलकी कोई परवा न करके धूमयुक्त अग्निकी भाँति सभाभवनसे बाहर निकल आये ॥ २७ ॥ ततो रथेन शुभ्रेण महता किङ्किणीकिना । हेमजालविचित्रेण लघुना मेघनादिना ॥ २८ ॥ सूपस्करेण शुभ्रेण वैयाघ्रेण वरूथिना । शैब्यसुग्रीवयुक्तेन प्रत्यदृश्यत दारुकः ॥ २९ ॥ बाहर आते ही शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए परम उज्ज्वल एवं विशाल रथके साथ सारथि दारुक दिखायी दिया। उस रथमें बहुत-सी क्षुद्रघंटिकाएँ शोभा पाती थीं। सोनेकी जालियोंसे उसकी विचित्र छटा दिखायी देती थी। वह शीघ्रगामी रथ चलते समय मेघके समान गम्भीर रव प्रकट करता था। उसके भीतर सब आवश्यक सामग्रियाँ सुन्दर ढंगसे सजाकर रखी गयी थीं। उसके ऊपर व्याघ्रचर्मका आवरण लगा हुआ था और रथकी रक्षाके अन्य आवश्यक प्रबन्ध भी किये गये थे ॥ २८-२९ ॥ तथैव रथमास्थाय कृतवर्मा महारथः । वृष्णीनां सम्मतो वीरो हार्दिक्यः समदृश्यत ॥ ३० ॥ इसी प्रकार वृष्णिवंशके सम्मानित वीर हृदिकपुत्र महारथी कृतवर्मा भी एक-दूसरे रथपर बैठे दिखायी दिये ॥ उपस्थितरथं शौरिं प्रयास्यन्तमरिंदमम् ।