भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 952

ये पार्थिवा राजसभां प्रविष्टा ब्रह्मर्षयो ये च सभासदोऽन्ये । शृण्वन्तु वक्ष्यामि तवापराधं पापस्य सामात्यपरिच्छदस्य ।। २९ ।। ‘जो-जो राजा, ब्रह्मर्षि तथा अन्य सभासद् इस राजसभाके भीतर आये हैं, वे सब लोग मन्त्री और सेवकोंसहित तुझ पापी दुर्योधनके अपराधोंको सुनें। मैं वर्णन करती हूँ ।। २९ ।।

राज्यं कुरूणामनुपूर्वभोज्यं क्रमागतो नः कुलधर्म एषः । त्वं पापबुद्धेऽतिनृशंसकर्मन् राज्यं कुरूणामनयाद् विहंसि ।। ३० ।। ‘हमारे यहाँ परम्परासे चला आनेवाला कुलधर्म यही है कि यह कुरुराज्य पूर्व-पूर्व अधिकारीके क्रमसे उपभोगमें आवे (अर्थात् पहले पिताके अधिकारमें रहे, फिर पुत्रके, पिताके जीते-जी पुत्र राज्यका अधिकारी नहीं हो सकता); परंतु अत्यन्त क्रूर कर्म करनेवाले पापबुद्धि दुर्योधन! तू अपने अन्यायसे इस कौरवराज्यका विनाश कर रहा है ।। ३० ।।

राज्ये स्थितो धृतराष्ट्रो मनीषी तस्यानुजो विदुरो दीर्घदर्शी । एतावतिक्रम्य कथं नृपत्वं दुर्योधन प्रार्थयसेऽद्य मोहात् ।। ३१ ।। ‘इस राज्यपर अधिकारीके रूपमें परम बुद्धिमान् धृतराष्ट्र और उनके छोटे भाई दूरदर्शी विदुर स्थापित किये गये थे। दुर्योधन! इन दोनोंका उल्लंघन करके तू आज मोहवश अपना प्रभुत्व कैसे जमाना चाहता है ।। ३१ ।।

राजा च क्षत्ता च महानुभावौ भीष्मे स्थिते परवन्तौ भवेताम् । अयं तु धर्मज्ञतया महात्मा न कामयेद् यो नृवरो नदीजः ।। ३२ ।। ‘राजा धृतराष्ट्र और विदुर—ये दोनों महानुभाव भी भीष्मके जीते-जी पराधीन ही रहेंगे (भीष्मके रहते इन्हें राज्य लेनेका कोई अधिकार नहीं है); परंतु धर्मज्ञ होनेके कारण ये नरश्रेष्ठ महात्मा गंगानन्दन राज्य लेनेकी इच्छा ही नहीं रखते हैं ।। ३२ ।।

राज्यं तु पाण्डोरिदमप्रधृष्यं तस्याद्य पुत्राः प्रभवन्ति नान्ये । राज्यं तदेतन्निखिलं पाण्डवानां पैतामहं पुत्रपौत्रानुगामि ।। ३३ ।।