भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1001

असत्यो विक्रमः पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणे । विशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।। ६५ ।। 'पार्थ! पराक्रम मिथ्या है, जिसका आश्रय लेनेपर भी वृष्णिवंशी सत्यपराक्रमी सात्यकिसे रणभूमिमें भूरिश्रवा बढ़ गये हैं' ।। ६५ ।। एवमुक्तो महाबाहुर्वासुदेवेन पाण्डवः । मनसा पूजयामास भूरिश्रवसमाहवे ।। ६६ ।। भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र महाबाहु अर्जुनने मन-ही-मन युद्धस्थलमें भूरिश्रवाकी प्रशंसा की ।। विकर्षन् सात्वतश्रेष्ठं क्रीडमान इवाहवे । संहर्षयति मां भूयः कुरूणां कीर्तिवर्धनः ।। ६७ ।। कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भूरिश्रवा इस युद्ध-स्थलमें सात्वतकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिको घसीटते हुए खेल-सा कर रहे हैं और बारंबार मेरा हर्ष बढ़ा रहे हैं ।। ६७ ।। प्रवरं वृष्णिवीराणां यन्न हन्याद्धि सात्यकिम् । महाद्विपमिवारण्ये मृगेन्द्र इव कर्षति ।। ६८ ।।