भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1228

ततः क्रुद्धो महाराज शैनेयः प्रहसन्निव । धनुश्चिच्छेद समरे कौरव्यस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने हँसते हुए-से समरांगणमें महामना कुरुवंशी भूरिके धनुषको काट दिया ॥ ७ ॥ अथैनं छिन्नधन्वानं नवभिर्निशितैः शरैः । विव्याध हृदये तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ८ ॥ धनुष कट जानेपर उसकी छातीमें सात्यकिने तुरंत ही नौ तीखे बाण मारे और कहा—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ सोऽतिविद्धो बलवता शत्रुणा शत्रुतापनः । धनु रन्यत् समादाय सात्वतं प्रत्यविध्यत ॥ ९ ॥ बलवान् शत्रुके आघातसे अत्यन्त घायल हुए शत्रुतापन भूरिने दूसरा धनुष हाथमें लेकर सात्यकिको भी गहरी चोट पहुँचायी ॥ ९ ॥ स विद्ध्वा सात्वतं बाणैस्त्रिभिरेव विशाम्पते । धनुश्चिच्छेद भल्लेन सुतीक्ष्णेन हसन्निव ॥ १० ॥ प्रजानाथ! तीन बाणोंसे ही सात्यकिको घायल करके भूरिने हँसते हुए-से अत्यन्त तीखे भल्लद्वारा उनके धनुषको भी काट दिया ॥ १० ॥ छिन्नधन्वा महाराज सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः । प्रजहार महावेगां शक्तिं तस्य महोरसि ॥ ११ ॥ महाराज! धनुष कट जानेपर क्रोधातुर हुए सात्यकिने भूरिके विशाल वक्षःस्थलपर एक अत्यन्त वेगशालिनी शक्तिका प्रहार किया ॥ ११ ॥ स तु शक्त्या विभिन्नाङ्गो निपपात रथोत्तमात् । लोहिताङ्ग इवाकाशाद् दीप्तरश्मिर्यदृच्छया ॥ १२ ॥ उस शक्तिसे भूरिके सारे अंग विदीर्ण हो गये और वह अपने उत्तम रथसे नीचे गिर पड़ा, मानो दैववश प्रदीप्त किरणोंवाला मंगलग्रह आकाशसे नीचे गिर गया हो ॥ १२ ॥ तं तु दृष्ट्वा हतं शूरमश्वत्थामा महारथः । अभ्यधावत वेगेन शैनेयं प्रति संयुगे ॥ १३ ॥ शूरवीर भूरिको युद्धस्थलमें मारा गया देख महारथी अश्वत्थामा सात्यकिकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ १३ ॥ तिष्ठ तिष्ठेति चाभाष्य शैनेयं स नराधिप । अभ्यवर्षच्छरौघेण मेरुं वृष्ट्या यथाम्बुदः ॥ १४ ॥ नरेश्वर! वह सात्यकिसे ‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ऐसा कहकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा, जैसे बादल मेरु पर्वतपर जल बरसा रहा हो ॥ १४ ॥ तमापतन्तं संरब्धं शैनेयस्य रथं प्रति ।