महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1250, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
नकुलके द्वारा शकुनिकी पराजय तथा शिखण्डी और कृपाचार्यका घोर युद्ध
संजय उवाच
नकुलं रभसं युद्धे निघ्नन्तं वाहिनीं तव ।
अभ्ययात् सौबलः क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! वेगशाली नकुल युद्धमें आपकी सेनाका संहार कर रहे थे। उनका सामना करनेके लिये क्रोधमें भरा हुआ सुबलपुत्र शकुनि आया और बोला ‘अरे! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ १ ॥
कृतवैरौ तु तौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ।
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २ ॥
उन दोनों वीरोंने पहलेसे ही आपसमें वैर बाँध रखा था, वे एक-दूसरेका वध करना चाहते थे; इसलिये पूर्णतः कानतक खींचकर छोड़े हुए बाणोंसे वे एक-दूसरेको घायल करने लगे ॥ २ ॥
यथैव नकुलो राजन् शरवर्षाण्यमुञ्चत ।
तथैव सौबलश्चापि शिक्षां संदर्शयन् युधि ॥ ३ ॥
राजन्! नकुल जैसे-जैसे बाणोंकी वर्षा करते, शकुनि भी वैसे-ही-वैसे युद्धविषयक शिक्षाका प्रदर्शन करता हुआ बाण छोड़ता था ॥ ३ ॥
तावुभौ समरे शूरौ शरकण्टकिनौ तदा ।
व्यराजेतां महाराज श्वाविधौ शललैरिव ॥ ४ ॥
महाराज! वे दोनों शूरवीर समरांगणमें बाणरूपी कंटकोंसे युक्त होकर काँटेदार शरीरवाले साहीके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ४ ॥
रुक्मपुङ्खैरजिह्माग्रैः शरैश्छिन्नतनुच्छदौ ।
रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृधे ॥ ५ ॥
तपनीयनिभौ चित्रौ कल्पवृक्षाविव द्रुमौ ।
किंशुकाविव चोत्फुल्लो प्रकाशेते रणाजिरे ॥ ६ ॥
सोनेके पंख और सीधे अग्रभागवाले बाणोंसे उन दोनोंके कवच छिन्न-भिन्न हो गये थे। दोनों ही उस महासमरमें खूनसे लथपथ हो सुवर्णके समान विचित्र कान्तिसे सुशोभित हो रहे थे। वे दो कल्पवृक्षों और खिले हुए दो ढाकके पेड़ोंके समान समरांगणमें प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५-६ ॥