महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1294, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रयुज्य कर्म रक्षोघ्नं क्षुद्रैः पार्थैर्निपातितः । ‘मेरे पिता जटासुर राक्षसोंके अगुआ थे। उन्हें पूर्वकालमें इन नीच कुन्तीकुमारोंने राक्षस-विनाशक कर्म करके मार गिराया ।। ७१/२ ।। तस्यापचितिमिच्छामि शत्रुशोणितपूजया । शत्रुमांसैश्च राजेन्द्र मामनुज्ञातुमर्हसि ।। ८ ।। ‘राजेन्द्र! मैं शत्रुओंके रक्त और मांसद्वारा पिताकी पूजा करके उनके वधका बदला लेना चाहता हूँ। आप इसके लिये मुझे आज्ञा दें’ ।। ८ ।। तमब्रवीत् ततो राजा प्रीयमाणः पुनः पुनः । द्रोणकर्णादिभिः सार्धं पर्याप्तोऽहं द्विषद्वधे ।। ९ ।। त्वं तु गच्छ मयाऽऽज्ञप्तो जहि युद्धे घटोत्कचम् । राक्षसं क्रूरकर्माणं रक्षोमानुषसम्भवम् ।। १० ।। तब राजा दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर बार-बार उससे कहा—‘वीरवर! द्रोणाचार्य और कर्ण आदिके साथ मिलकर मैं स्वयं ही तुम्हारे शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हूँ। तुम तो मेरी आज्ञासे घटोत्कचके पास जाओ और युद्धमें उसे मार डालो। वह क्रूरकर्मा निशाचर मनुष्य और राक्षस दोनोंके अंशसे उत्पन्न हुआ है ।। ९-१० ।। पाण्डवानां हितं नित्यं हस्त्यश्वरथघातिनम् । वैहायसगतं युद्धे प्रेषयेर्यमसादनम् ।। ११ ।। ‘हाथियों, घोड़ों तथा रथोंका विनाश करनेवाला आकाशचारी राक्षस घटोत्कच सदा पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहता है। तुम युद्धमें उसे मारकर यमलोक भेज दो’ ।। ११ ।। तथेत्युक्त्वा महाकायः समाहूय घटोत्कचम् । जाटासुरिर्भैमसेनिं नानाशस्त्रैरवाकिरत् ।। १२ ।। जटासुरके पुत्रका नाम अलम्बुष था। उस विशालकाय राक्षसने दुर्योधनसे ‘तथास्तु’ कहकर भीमसेनपुत्र घटोत्कचको ललकारा और उसके ऊपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। १२ ।। अलम्बुषं च कर्णं च कुरुसैन्यं च दुस्तरम् । हैडिम्बिः प्रममाथैको महावातोऽम्बुदानिव ।। १३ ।। जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अकेले हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने अलम्बुष, कर्ण तथा उस दुर्लङ्घ्य कौरव-सेनाको भी मथ डाला ।। १३ ।। ततो मायाबलं दृष्ट्वा रक्षस्तूर्णमलम्बुषः । घटोत्कचं शरव्रातैर्नालिङ्गैः समर्पयत् ।। १४ ।। राक्षस अलम्बुषने घटोत्कचका मायाबल देखकर उसके ऊपर तुरंत ही नाना प्रकारके बाणसमूहोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। १४ ।। विद्ध्वा च बहुभिर्बाणैर्भैमसेनिं महाबलः ।