महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1321, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेन और अलायुधका घोर युद्ध
संजय उवाच
तमागतमभिप्रेक्ष्य भीमकर्माणमाहवे ।
हर्षमाहारयांचक्रुः कुरवः सर्व एव ते ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! युद्धस्थलमें भयंकर कर्म करनेवाले अलायुधको आया हुआ देख सभी कौरव-योद्धा बड़े प्रसन्न हुए ॥ १ ॥
तथैव तव पुत्रास्ते दुर्योधनपुरोगमाः ।
अप्लवाः प्लवमासाद्य तर्तुकामा इवार्णवम् ॥ २ ॥
उसी प्रकार आपके दुर्योधन आदि पुत्रोंको भी बड़ा हर्ष हुआ, मानो समुद्रके पार जानेकी इच्छावाले नौकाहीन पुरुषोंको जहाज मिल गया हो ॥ २ ॥
पुनर्जातमिवात्मानं मन्वानाः पुरुषर्षभाः ।
अलायुधं राक्षसेन्द्रं स्वागतेनाभ्यपूजयन् ॥ ३ ॥
वे पुरुषप्रवर कौरव अपना नया जन्म हुआ मानने लगे। उन्होंने राक्षसराज अलायुधका स्वागतपूर्वक सत्कार किया ॥ ३ ॥
तस्मिंस्त्वमानुषे युद्धे वर्तमाने महाभये ।
कर्णराक्षसयोर्नक्तं दारुणप्रतिदर्शने ॥ ४ ॥
(न द्रौणिर्न कृपो द्रोणो न शल्यो न च माधवः ।
एक एव तु तेनासीद् योद्धा कर्णो रणे वृषा ॥)
उस रात्रिकालमें जब कर्ण और घटोत्कचका अत्यन्त भयंकर और दारुण अमानुषिक युद्ध चल रहा था। उस समय न तो अश्वत्थामा, न कृपाचार्य, न द्रोणाचार्य, न शल्य और न कृतवर्मा ही घटोत्कचका सामना कर सके। अकेला दानवीर कर्ण ही रणभूमिमें उसके साथ जूझ रहा था ॥ ४ ॥
उपप्रैक्षन्त पञ्चालाः स्मयमानाः सराजकाः ।
तथैव तावका राजन् वीक्षमाणास्ततस्ततः ॥ ५ ॥
राजन्! पांचाल योद्धा अन्यान्य राजाओंके साथ विस्मित होकर वह युद्ध देखने लगे। उसी प्रकार आपके सैनिक भी इधर-उधरसे उसी युद्धका दृश्य देख रहे थे ॥ ५ ॥
चुक्रुशुर्नेदमस्तीति द्रोणद्रौणिकृपादयः ।
तत् कर्म दृष्ट्वा सम्भ्रान्ता हैडिम्बस्य रणाजिरे ॥ ६ ॥
समरांगणमें हिडिम्बाकुमार घटोत्कचका वह अलौकिक कर्म देखकर घबराये हुए द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कृपाचार्य आदि चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे कि ‘अब हमारी