महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
घटोत्कचका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा चलायी हुई इन्द्रप्रदत्त शक्तिसे उसका वध
संजय उवाच
निहत्यालायुधं रक्षः प्रहृष्टात्मा घटोत्कचः ।
ननाद विविधान् नादान् वाहिन्याः प्रमुखे तव ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! राक्षस अलायुधका वध करके घटोत्कच मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ और वह आपकी सेनाके सामने खड़ा हो नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगा ॥ १ ॥
तस्य तं तुमुलं शब्दं श्रुत्वा कुञ्जरकम्पनम् ।
तावकानां महाराज भयमासीत् सुदारुणम् ॥ २ ॥
महाराज! उसकी वह भयंकर गर्जना हाथियोंको भी कँपा देनेवाली थी। उसे सुनकर आपके योद्धाओंके मनमें अत्यन्त दारुण भय समा गया ॥ २ ॥
अलायुधविषक्तं तु भैमसैनिं महाबलम् ।
दृष्ट्वा कर्णो महाबाहुः पञ्चालान् समुपाद्रवत् ॥ ३ ॥
जिस समय महाबली घटोत्कच अलायुधके साथ उलझा हुआ था, उस समय उसे उस अवस्थामें देखकर महाबाहु कर्णने पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥
दशभिर्दशभिर्बाणैर्धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।
दृढैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्बिभेद नतपर्वभिः ॥ ४ ॥
उसने पूर्णतः खींचकर छोड़े गये झुकी हुई गाँठवाले दस-दस सुदृढ़ बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न और शिखण्डीको घायल कर दिया ॥ ४ ॥
ततः परमनाराचैर्युधामन्यूत्तमौजसौ ।
सात्यकिं च रथोदारं कम्पयामास मार्गणैः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् उसने अच्छे-अच्छे नाराचोंद्वारा युधामन्यु और उत्तमौजाको तथा अनेक बाणोंसे उदार महारथी सात्यकिको भी कम्पित कर दिया ॥ ५ ॥
तेषामप्यस्यतां संख्ये सर्वेषां सव्यदक्षिणम् ।
मण्डलान्येव चापानि व्यदृश्यन्त जनाधिप ॥ ६ ॥
नरेश्वर! वे सात्यकि आदि भी बायें-दायें बाण चला रहे थे। उस समय उन सबके धनुष भी मण्डलाकार ही दिखायी देते थे ॥ ६ ॥
तेषां ज्यातलनिर्घोषो रथनेमिस्वनश्च ह ।