भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनके वीरोचित उद्गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन

संजय उवाच

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः । अप्रियं वा प्रियं वापि महाराज धनंजयम् ॥ १ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! अर्जुनकी यह बात सुनकर वहाँ बैठे हुए सब महारथी मौन रह गये। उनसे प्रिय या अप्रिय कुछ नहीं बोले ॥ १ ॥

ततः क्रुद्धो महाबाहुर्भीमसेनोऽभ्यभाषत । कुत्सयन्निव कौन्तेयमर्जुनं भरतर्षभ ॥ २ ॥ भरतश्रेष्ठ! तब महाबाहु भीमसेनको क्रोध चढ़ आया। उन्होंने कुन्तीकुमार अर्जुनको फटकारते हुए-से कहा ॥ २ ॥

मुनिर्यथारण्यगतो भाषसे धर्मसंहितम् । न्यस्तदण्डो यथा पार्थ ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ३ ॥ 'पार्थ! वनवासी मुनि अथवा किसी भी प्राणीको दण्ड न देते हुए कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण जिस प्रकार धर्मका उपदेश करता है, उसी प्रकार तुम भी धर्मसम्मत बातें कह रहे हो ॥ ३ ॥

क्षतत्राता क्षताज्जीवन् क्षन्ता स्त्रीष्वपि साधुषु । क्षत्रियः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रियः ॥ ४ ॥ 'परंतु जो क्षति (संकट)-से अपना तथा दूसरोंका त्राण करता है, युद्धमें शत्रुओंको क्षति पहुँचाना ही जिसकी जीविका है तथा जो स्त्रियों और साधु पुरुषोंपर क्षमाभाव रखता है, वही क्षत्रिय है और उसे ही शीघ्र इस पृथ्वीके राज्य, धर्म, यश और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥

स भवान् क्षत्रियगुणैर्युक्तः सर्वैः कुलोद्वहः । अविपश्चिद् यथा वाचं व्याहरन् नाद्य शोभसे ॥ ५ ॥ 'तुम समस्त क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न और इस कुलका भार वहन करनेमें समर्थ होते हुए भी आज मूर्खके समान बातें कर रहे हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥ ५ ॥

पराक्रमस्ते कौन्तेय शक्रस्येव शचीपतेः । न चाति वर्तसे धर्मं वेलामिव महोदधिः ॥ ६ ॥