महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1745, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः
युयुत्सु और उलूकका युद्ध, युयुत्सुका पलायन, शतानीक और धृतराष्ट्रपुत्र श्रुतकर्माका तथा सुतसोम और शकुनिका घोर युद्ध एवं शकुनिद्वारा पाण्डव-सेनाका विनाश
संजय उवाच
युयुत्सुं तव पुत्रस्य द्रावयन्तं बलं महत् ।
उलूको न्यपतत्तूर्णं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! दूसरी ओर युयुत्सु आपके पुत्रकी विशाल सेनाको खदेड़ रहा था। यह देख उलूक तुरंत वहाँ आ धमका और युयुत्सुसे बोला—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ १ ॥
युयुत्सुश्च ततो राजन् शितधारेण पत्रिणा ।
उलूकं ताडयामास वज्रेणेन्द्र इवाचलम् ॥ २ ॥
राजन्! तब युयुत्सुने तीखी धारवाले बाणसे महाबली उलूकको उसी प्रकार पीट दिया, जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्रका प्रहार करते हैं ॥ २ ॥
उलूकस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रस्य संयुगे ।
क्षुरप्रेण धनुश्छित्त्वा ताडयामास कर्णिना ॥ ३ ॥
इससे उलूकको बड़ा क्रोध हुआ। उसने युद्धस्थलमें एक क्षुरप्रके द्वारा आपके पुत्रका धनुष काटकर उसपर कर्णी नामक बाणका प्रहार किया ॥ ३ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं युयुत्सुर्वेगवत्तरम् ।
अन्यदादत्त सुमहच्चापं संरक्तलोचनः ॥ ४ ॥
युयुत्सुने उस कटे हुए धनुषको फेंककर क्रोधसे आँखें लाल करके दूसरा अत्यन्त वेगशाली एवं विशाल धनुष हाथमें लिया ॥ ४ ॥
शाकुनिं तु ततः षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ ।
सारथिं त्रिभिरानर्च्छत्तं च भूयो व्यविध्यत ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उसने शकुनिपुत्र उलूकको साठ बाणोंसे बेध दिया और तीन बाणोंसे उसके सारथिको पीड़ित किया। तत्पश्चात् उसे और भी घायल कर दिया ॥ ५ ॥
उलूकस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा स्वर्णविभूषितैः ।
अथास्य समरे क्रुद्धो ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ६ ॥