भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1873, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1873

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चत्वारिंशोऽध्यायः

कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना

संजय उवाच

अधिक्षिप्तस्तु राधेयः शल्येनामिततेजसा । शल्यमाह सुसंक्रुद्धो वाक्शल्यमवधारयन् ।। १ ।।

**संजय कहते हैं—**राजन्! अमिततेजस्वी शल्यके इस प्रकार आक्षेप करनेपर राधापुत्र कर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और यह वचनरूपी शल्य (बाण) छोड़नेके कारण ही इसका नाम शल्य पड़ा है, ऐसा निश्चय करके शल्यसे इस प्रकार बोला ।। १ ।।

कर्ण उवाच

गुणान् गुणवतां शल्य गुणवान् वेत्ति नागुणः । त्वं तु शल्य गुणैर्हीनः किं ज्ञास्यसि गुणागुणम् ।। २ ।।

**कर्णने कहा—**शल्य! गुणवान् पुरुषोंके गुणोंको गुणवान् ही जानता है, गुणहीन नहीं। तुम तो समस्त गुणोंसे शून्य हो; फिर गुण-अवगुण क्या समझोगे? ।। २ ।।

अर्जुनस्य महास्त्राणि क्रोधं वीर्यं धनुः शरान् । अहं शल्याभिजानामि विक्रमं च महात्मनः ।। ३ ।।

शल्य! मैं महात्मा अर्जुनके महान् अस्त्र, क्रोध, बल, धनुष, बाण और पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ ।। ३ ।।

तथा कृष्णस्य माहात्म्यमृषभस्य महीक्षिताम् । यथाहं शल्य जानामि न त्वं जानासि तत् तथा ।। ४ ।।

शल्य! इसी प्रकार महीपालशिरोमणि श्रीकृष्णके माहात्म्यको जैसा मैं जानता हूँ, वैसा तुम नहीं जानते ।। ४ ।।

एवमेवात्मनो वीर्यमहं वीर्यं च पाण्डवे । जानन्नेवाह्वये युद्धे शल्य गाण्डीवधारिणम् ।। ५ ।।

शल्य! मैं अपना और पाण्डुपुत्र अर्जुनका बल-पराक्रम समझकर ही गाण्डीवधारी पार्थको युद्धके लिये बुलाता हूँ ।। ५ ।।

अस्ति वायमिषुः शल्य सुपुङ्खो रक्तभोजनः । एकतूणीशयः पत्री सुधौतः समलंकृतः ।। ६ ।।

शल्य! मेरा यह सुन्दर पंखोंसे युक्त बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाला है। यह अकेले ही एक तरकसमें रखा जाता है, जो बहुत ही स्वच्छ, कंकपत्रयुक्त और भलीभाँति अलंकृत