भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2000

इस प्रकार वे सब हजारों योद्धा रथको जबरदस्ती पकड़कर सिंहनाद करने लगे ।। १४
१/३ ।।

अपरे जगृहूश्चैव केशवस्य महाभुजौ ।। १५ ।।
पार्थमन्ये महाराज रथस्थं जगृहुर्मुदा ।
महाराज! कई योद्धाओंने भगवान् श्रीकृष्णकी दोनों विशाल भुजाएँ पकड़ लीं। दूसरोंने रथपर बैठे हुए अर्जुनको भी प्रसन्नतापूर्वक पकड़ लिया ।। १५ १/२ ।।

केशवस्तु ततो बाहू विधुन्वन् रणमूर्धनि ।। १६ ।।
पातयामास तान् सर्वान् दुष्टहस्तीव हस्तिपान् ।
तब जैसे दुष्ट हाथी महावतोंको नीचे गिरा देता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अपनी दोनों बाँहें झटककर उन सब लोगोंको युद्धके मुहानेपर नीचे गिरा दिया ।। १६ १/२ ।।

ततः क्रुद्धो रणे पार्थः संवृतस्तैर्महारथैः ।। १७ ।।
निगृहीतं रथं दृष्ट्वा केशवं चाप्यभिद्रुतम् ।
फिर उन महारथियोंसे घिरे हुए अर्जुन अपने रथको पकड़ा गया और श्रीकृष्णपर भी आक्रमण हुआ देख रणभूमिमें कुपित हो उठे ।। १७ १/२ ।।

रथारूढांस्तु सुबहून् पदातींश्चाप्यपातयत् ।। १८ ।।
आसन्नांश्च तथा योधन् शरैरासन्नयोधिभिः ।
छादयामास समरे केशवं चेदमब्रवीत् ।। १९ ।।
उन्होंने अपने रथपर चढ़े हुए बहुत-से पैदल सैनिकोंको धक्के देकर नीचे गिरा दिया और आस-पास खड़े हुए संशप्तक-योद्धाओंको निकटसे युद्ध करनेमें उपयोगी बाणोंद्वारा ढक दिया एवं समरांगणमें भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ।। १८-१९ ।।

पश्य कृष्ण महाबाहो संशप्तकगणान् बहून् ।
कुर्वाणान् दारुणं कर्म वध्यमानान् सहस्रशः ।। २० ।।
‘महाबाहु श्रीकृष्ण! देखिये, ये क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले बहुसंख्यक संशप्तक योद्धा किस प्रकार सहस्रोंकी संख्यामें मारे जा रहे हैं ।। २० ।।

रथबन्धमिमं घोरं पृथिव्यां नास्ति कश्चन ।
यः सहेत पुमाँल्लोके मदन्यो यदुपुङ्गव ।। २१ ।।
‘यदुपुंगव! जगत्‌में इस भूतलपर मेरे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस भयानक रथबन्ध (रथकी पकड़ अथवा रथोंके घेरे)-का सामना कर सके’ ।। २१ ।।

इत्येवमुक्त्वा बीभत्सुर्देवदत्तमथाधमत् ।
पाञ्चजन्यं च कृष्णोऽपि पूरयन्निव रोदसी ।। २२ ।।
ऐसा कहकर अर्जुनने देवदत्त नामक शंख बजाया। फिर भगवान् श्रीकृष्णने भी पृथ्वी और आकाशको गुँजाते हुए-से पांचजन्य नामक शंखकी ध्वनि फैलायी ।। २२ ।।

तं तु शङ्खस्वनं श्रुत्वा संशप्तकवरूथिनी ।