महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2093, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःषष्टितमोऽध्यायः
अर्जुनद्वारा अश्वत्थामाकी पराजय, कौरव-सेनामें भगदड़ एवं दुर्योधनसे प्रेरित कर्णद्वारा भार्गवास्त्रसे पांचालोंका संहार
संजय उवाच
द्रौणिस्तु रथवंशेन महता परिवारितः ।
अपतत् सहसा राजन् यत्र पार्थो व्यवस्थितः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा विशाल रथसेनासे घिरा सहसा वहाँ आ पहुँचा, जहाँ अर्जुन खड़े थे ॥ १ ॥
तमापतन्तं सहसा शूरः शौरिसहायवान् ।
दधार सहसा पार्थो वेलेव मकरालयम् ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सहायक थे, उन शूरवीर कुन्तीकुमार अर्जुनने सहसा अपनी ओर आते हुए अश्वत्थामाको तत्काल उसी तरह रोक दिया, जैसे तटभूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकती है ॥ २ ॥
ततः क्रुद्धो महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
अर्जुनं वासुदेवं च छादयामास सायकैः ॥ ३ ॥
महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए प्रतापी द्रोणपुत्रने अर्जुन और श्रीकृष्णको अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ ३ ॥
अवच्छन्नौ ततः कृष्णौ दृष्ट्वा तत्र महारथाः ।
विस्मयं परमं गत्वा प्रैक्षन्त कुरवस्तदा ॥ ४ ॥
उस समय उन दोनोंको बाणोंद्वारा आच्छादित हुआ देख समस्त कौरव महारथी महान् आश्चर्यमें पड़कर उधर ही देखने लगे ॥ ४ ॥
अर्जुनस्तु ततो दिव्यमस्त्रं चक्रे हसन्निव ।
तदस्त्रं वारयामास ब्राह्मणो युधि भारत ॥ ५ ॥
भारत! तब अर्जुनने हँसते हुए-से दिव्यास्त्र प्रकट किया; परंतु ब्राह्मण अश्वत्थामाने युद्धस्थलमें उनके उस दिव्यास्त्रका निवारण कर दिया ॥ ५ ॥
यद् यद्धि व्याक्षिपद् युद्धे पाण्डवोऽस्त्रजिघांसया ।
तत् तदस्त्रं महेष्वासो द्रोणपुत्रो व्यशातयत् ॥ ६ ॥
रणभूमिमें पाण्डुकुमार अर्जुन अश्वत्थामाके अस्त्रोंको नष्ट करनेके लिये जो-जो अस्त्र चलाते थे, महाधनुर्धर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उनके उस-उस अस्त्रको काट गिराता था ॥ ६ ॥