महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(आलोक्य तौ तत्र परस्परं ततः समं च शूरौ च ससारथी तदा । भीमोऽब्रवीद् याहि दुःशासनाय दुःशासनो याहि वृकोदराय ॥ सारथिसहित उन दोनों शूरवीरोंने जब वहाँ एक-दूसरेको एक साथ देखा तब भीमने अपने सारथिसे कहा—'दुःशासनकी ओर चलो' और दुःशासनने अपने सारथिसे कहा—'भीमसेनकी ओर चलो'।
तयोरथौ सारथिभ्यां प्रचोदितौ समं रणे तौ सहसा समीयतुः । नानायुधौ चित्रपताकिनौ ध्वजौ दिवीव पूर्वं बलशक्रयो रणे ॥ सारथियोंद्वारा एक साथ हाँके गये उन दोनोंके रथ रणभूमिमें दोनोंके पास सहसा जा पहुँचे। वे दोनों ही रथ नाना प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न तथा विचित्र पताकाओं और ध्वजाओंसे सुशोभित थे। जैसे पूर्वकालमें स्वर्गके निमित्त होनेवाले युद्धमें बलासुर और इन्द्रके रथ थे, उसी प्रकार दुःशासन और भीमसेनके भी थे।
भीम उवाच
दिष्ट्यासि दुःशासन मेऽद्य दृष्टः ऋणं प्रतीच्छे सहवृद्धिमूलम् । चिरोद्यतं यन्मया ते सभायां कृष्णाभिमर्शेन गृहाण मत्तः ॥ **भीमसेन बोले—**दुःशासन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तू आज मुझे दिखायी दिया है। कौरव-सभामें द्रौपदीका स्पर्श करनेके कारण दीर्घकालसे जो तेरा ऋण मेरे ऊपर चढ़ गया है, उसे मैं आज ब्याज और मूलसहित चुकाना चाहता हूँ। तू मुझसे वह सब ग्रहण कर।
संजय उवाच
स एवमुक्तस्तु ततो महात्मा दुःशासनो वाक्यमुवाच वीरः । **संजय कहते हैं—**राजन्! भीमसेनके ऐसा कहनेपर महामनस्वी वीर दुःशासनने इस प्रकार कहा।
दुःशासन उवाच
सर्वं स्मरे नैव च विस्मरामि उदीर्यमाणं शृणु भीमसेन ॥