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भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2358, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2358

अथार्जुनस्योत्तमगात्रभूषणं धरावियद्द्योसलिलेषु विश्रुतम् ॥ ३२ ॥ बुद्धिमान् अर्जुनके मस्तकको विभूषित करनेवाला किरीट भूतल, अन्तरिक्ष, स्वर्ग और वरुणलोकमें भी विख्यात था। वह मुकुट उन्हें इन्द्रने प्रदान किया था। कर्णका चलाया हुआ वह सर्पमुख बाण रथ नीचा हो जानेके कारण अर्जुनके उसी किरीटमें जा लगा ॥ ३२ ॥

व्यालास्त्रसर्गोत्तमयत्नमन्युभिः शरेण मूर्ध्नः प्रजहार सूतजः । दिवाकरेन्दुज्वलनप्रभत्विषं सुवर्णमुक्तामणिवज्रभूषितम् ॥ ३३ ॥ सूतपुत्र कर्णने सर्पमुख बाणके निर्माणकी सफलता, उत्तम प्रयत्न और क्रोध—इन सबके सहयोगसे जिस बाणका प्रयोग किया था, उसके द्वारा अर्जुनके मस्तकसे उस किरीटको नीचे गिरा दिया, जो सूर्य, चन्द्रमा और अग्निके समान कान्तिमान् तथा सुवर्ण, मुक्ता, मणि एवं हीरोंसे विभूषित था ॥ ३३ ॥

पुरन्दरार्थं तपसा प्रयत्नतः स्वयं कृतं यद् विभुना स्वयम्भुवा । महार्हरूपं द्विषतां भयंकरं बिभर्तुरत्यर्थसुखं सुगन्धिनम् ॥ ३४ ॥ जिघांसते देवरिपून् सुरेश्वरः स्वयं ददौ यत् सुमनाः किरीटिने । हराम्बुपाखण्डलवित्तगोप्तृभिः पिनाकपाशाशनिसाएकोत्तमैः ॥ ३५ ॥ सुरोत्तमैरप्यविषह्यमर्दितुं प्रसह्य नागेन जहार तद् वृषः । स दुष्टभावो वितथप्रतिज्ञः किरीटमत्यद्भुतमर्जुनस्य ॥ ३६ ॥ नागो महार्हं तपनीयचित्रं पार्थोत्तमाङ्गात् प्रहरत् तरस्वी ।