भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2473

स्वङ्गं प्रच्छन्नशिरसं कम्बुग्रीवं प्रियंवदम् । व्याकोशपद्मपत्राक्षं व्याघ्रास्यं मेरुगौरवम् ॥ ८ ॥ स्थाणोर्वृषस्य सदृशं स्कन्धनेत्रगतिस्वरैः । पुष्टश्लिष्टायतभुजं सुविस्तीर्णवरोरसम् ॥ ९ ॥ बले जवे च सदृशमरुणानुजवातयोः । आदित्यस्यार्चिषा तुल्यं बुद्ध्या चौशनसा समम् ॥ १० ॥ कान्तिरूपमुखैश्वर्यैस्त्रिभिश्चन्द्रमसा समम् । काञ्चनोपलसंघातैः सदृशं श्लिष्टसंधिकम् ॥ ११ ॥ सुवृत्तोरुकटीजङ्घं सुपादं स्वङ्गुलीनखम् । स्मृत्वा स्मृत्वैव तु गुणान् धात्रा यत्नाद् विनिर्मितम् ॥ १२ ॥ सर्वलक्षणसम्पन्नं निपुणं श्रुतिसागरम् । जेतारं तरसारीणामजेयमरिभिर्बलात् ॥ १३ ॥ दशाङ्गं यश्चतुष्पादमिश्वस्त्रं वेद तत्त्वतः । साङ्गांस्तु चतुरो वेदान् सम्यगाख्यानपञ्चमान् ॥ १४ ॥ आराध्य त्र्यम्बकं यत्नाद् व्रतैरुग्रैर्महातपाः । अयोनिजायामुत्पन्नो द्रोणेनायोनिजेन यः ॥ १५ ॥ तमप्रतिमकर्माणं रूपेणाप्रतिमं भुवि । पारगं सर्वविद्यानां गुणार्णवमनिन्दितम् ॥ १६ ॥ तमभ्येत्यात्मजस्तुभ्यमश्वत्थामानमब्रवीत् ।

राजन्! तब आपका पुत्र दुर्योधन रथपर बैठकर अश्वत्थामाके निकट गया। अश्वत्थामा महारथियोंमें श्रेष्ठ, युद्धविषयक सभी विभिन्न भावोंका ज्ञाता और युद्धमें यमराजके समान भयंकर है। उसके अंग सुन्दर हैं, मस्तक केशोंसे आच्छादित है और कण्ठ शंखके समान सुशोभित होता है। वह प्रिय वचन बोलनेवाला है। उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर और मुख व्याघ्रके समान भयंकर है। उसमें मेरुपर्वतकी-सी गुरुता है। स्कन्ध, नेत्र, गति और स्वरमें वह भगवान् शंकरके वाहन वृषभके समान है। उसकी भुजाएँ पुष्ट, सुगठित एवं विशाल हैं। वक्षःस्थलका उत्तमभाग भी सुविस्तृत है। वह बल और वेगमें गरुड़ एवं वायुकी बराबरी करनेवाला है। तेजमें सूर्य और बुद्धिमें शुक्राचार्यके समान है। कान्ति, रूप तथा मुखकी शोभा—इन तीन गुणोंमें वह चन्द्रमाके तुल्य है। उसका शरीर सुवर्णमय प्रस्तरसमूहके समान सुशोभित होता है। अंगोंका जोड़ या संधिस्थान भी सुगठित है। ऊरु, कटिप्रदेश और पिण्डलियाँ—ये सुन्दर और गोल हैं। उसके दोनों चरण मनोहर हैं। अंगुलियाँ और नख भी सुन्दर हैं, मानो विधाताने उत्तम गुणोंका बारंबार स्मरण करके बड़े यत्नसे उसके अंगोंका निर्माण किया हो। वह समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त कार्योंमें कुशल और वेदविद्याका समुद्र है। अश्वत्थामा शत्रुओंपर वेगपूर्वक विजय पानेमें समर्थ है।