महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुस्त्रिंशोऽध्यायः
संजयके द्वारा अभिमन्युकी प्रशंसा, द्रोणाचार्यद्वारा चक्रव्यूहका निर्माण
संजय उवाच
समरेऽत्युग्रकर्माणः कर्मभिर्व्यज्जितश्रमाः ।
सकृष्णाः पाण्डवाः पञ्च देवैरपि दुरासदाः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं। वे समरभूमिमें अत्यन्त भयंकर कर्म करनेवाले हैं। उनके कर्मोंद्वारा ही उनका परिश्रम अभिव्यक्त होता है ॥ १ ॥
सत्त्वकर्मान्वयैर्बुद्ध्या कीर्त्या च यशसा श्रिया ।
नैव भूतो न भविता नैव तुल्यगुणः पुमान् ॥ २ ॥
सत्त्वगुण, कर्म, कुल, बुद्धि, कीर्ति, यश और श्रीके द्वारा युधिष्ठिरके समान पुरुष दूसरा कोई न तो हुआ है और न होनेवाला ही है ॥ २ ॥
सत्यधर्मरतो दान्तो विप्रपूजादिभिर्गुणैः ।
सदैव त्रिदिवं प्राप्तो राजा किल युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
कहते हैं, राजा युधिष्ठिर सत्यधर्मपरायण और जितेन्द्रिय होनेके साथ ही ब्राह्मण-पूजन आदि सद्गुणोंके द्वारा सदा ही स्वर्गलोकको प्राप्त हैं ॥ ३ ॥
युगान्ते चान्तको राजन् जामदग्न्यश्च वीर्यवान् ।
रथस्थो भीमसेनश्च कथ्यन्ते सदृशास्त्रयः ॥ ४ ॥
राजन्! प्रलयकालके यमराज, पराक्रमी परशुराम और रथपर बैठे हुए भीमसेन—ये तीनों एक समान कहे जाते हैं ॥ ४ ॥
प्रतिज्ञाकर्मदक्षस्य रणे गाण्डीवधन्वनः ।
उपमां नाधिगच्छामि पार्थस्य सदृशीं क्षितौ ॥ ५ ॥
रणभूमिमें प्रतिज्ञापूर्वक कर्म करनेमें कुशल, गाण्डीवधारी कुन्तीकुमार अर्जुनके लिये तो मुझे इस पृथिवीपर कोई उनके योग्य उपमा ही नहीं मिलती है ॥ ५ ॥
गुरुवात्सल्यमत्यन्तं नैभृत्यं विनयो दमः ।
नकुलेऽप्रतिरूप्यं च शौर्यं च नियतानि षट् ॥ ६ ॥
बड़े भाईके प्रति अत्यन्त भक्ति, अपने पराक्रमको प्रकाशित न करना, विनयशीलता, इन्द्रिय-संयम, उपमा-रहित रूप तथा शौर्य—ये नकुलमें छः गुण निश्चितरूपसे निवास करते हैं ॥ ६ ॥