भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2978, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2978

ग्रहनक्षत्रताराभिः सम्पूर्णाभिरलंकृतम् । नभोऽशुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ २५ ॥ सम्पूर्ण ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओंसे अलंकृत हुआ आकाश जरीकी साड़ीके समान सब ओरसे देखनेयोग्य प्रतीत होता था ॥ २५ ॥

इच्छया ते प्रवल्गन्ति ये सत्त्वा रात्रिचारिणः । दिवाचराश्च ये सत्त्वास्ते निद्रावशमागताः ॥ २६ ॥ रात्रिमें विचरनेवाले प्राणी अपनी इच्छाके अनुसार उछल-कूद मचाने लगे और जो दिनमें विचरनेवाले जीव-जन्तु थे, वे निद्राके अधीन हो गये ॥ २६ ॥

रात्रिंचराणां सत्त्वानां निर्घोषोऽभूत् सुदारुणः । क्रव्यादाश्च प्रमुदिता घोरा प्राप्ता च शर्वरी ॥ २७ ॥ रात्रिमें घूमने-फिरनेवाले जीवोंका अत्यन्त भयंकर शब्द प्रकट होने लगा। मांसभक्षी प्राणी प्रसन्न हो गये और वह भयंकर रात्रि सब ओर व्याप्त हो गयी ॥ २७ ॥

तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः । कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ॥ २८ ॥ रात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था। उस भयंकर वेलामें दुःख और शोकसे संतप्त हुए कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा एक साथ ही आस-पास बैठ गये ॥ २८ ॥

तत्रोपविष्टाः शोचन्तो न्यग्रोधस्य समीपतः । तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवयोः क्षयम् ॥ २९ ॥ निद्रया च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले । श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ॥ ३० ॥ वटवृक्षके समीप बैठकर कौरवों तथा पाण्डव-योद्धाओंके उसी विनाशकी बीती हुई बातके लिये शोक करते हुए वे तीनों वीर निद्रासे सारे अंग शिथिल हो जानेके कारण पृथ्वीपर लेट गये। उस समय वे भारी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और नाना प्रकारके बाणोंसे उनके सारे अंग क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ २९-३० ॥

ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजौ महारथौ । सुखोचितावदुःखार्हौ निषण्णौ धरणीतले ॥ ३१ ॥ तदनन्तर कृपाचार्य और कृतवर्मा—इन दोनों महारथियोंको गाढ़ी नींद आ गयी। वे सुख भोगनेके योग्य थे, दुःख पानेके योग्य कदापि नहीं थे, तो भी धरतीपर ही सो गये थे ॥ ३१ ॥

तौ तु सुप्तौ महाराज श्रमशोकसमन्वितौ । महार्हशयनोपेतौ भूमावेव ह्यनाथवत् ॥ ३२ ॥ क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत । न वै स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ॥ ३३ ॥

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