महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3005, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिखण्डिनं पुरस्कृत्य हतो गाण्डीवधन्वना ॥ २१ ॥ इसी प्रकार शान्तनुनन्दन भीष्म जब हथियार डालकर अस्त्रहीन हो गये, उस अवस्थामें शिखण्डीको आगे करके गाण्डीवधारी धनंजयने उनका वध किया था ॥ २१ ॥ भूरिश्रवा महेष्वासस्तथा प्रायगतो रणे । क्रोशतां भूमिपालानां युयुधानेन पातितः ॥ २२ ॥ महाधनुर्धर भूरिश्रवा तो रणभूमिमें अनशन व्रत लेकर बैठ गये थे। उस अवस्थामें समस्त भूमिपाल चिल्ला-चिल्लाकर रोकते ही रह गये; परंतु सात्यकिने उन्हें मार गिराया ॥ २२ ॥ दुर्योधनश्च भीमेन समेत्य गदया रणे । पश्यतां भूमिपालानामधर्मेण निपातितः ॥ २३ ॥ भीमसेनने भी सम्पूर्ण राजाओंके देखते-देखते रणभूमिमें गदायुद्ध करते समय दुर्योधनको अधर्मपूर्वक गिराया था ॥ २३ ॥ एकाकी बहुभिस्तत्र परिवार्य महारथैः । अधर्मेण नरव्याघ्रो भीमसेनेन पातितः ॥ २४ ॥ नरश्रेष्ठ राजा दुर्योधन अकेला था और बहुत-से महारथियोंने उसे वहाँ घेर रखा था, उस दशामें भीमसेनने उसको धराशायी किया है ॥ २४ ॥ विलापो भग्नसक्थस्य यो मे राज्ञः परिश्रुतः । वार्तिकानां कथयतां स मे मर्माणि कृन्तति ॥ २५ ॥ टूटी जाँघोंवाले राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने सुना है और संदेशवाहक दूतोंके मुखसे जो समाचार मुझे ज्ञात हुआ है, वह सब मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है ॥ २५ ॥ एवं चाधार्मिकाः पापाः पञ्चाला भिन्नसेतवः । तानेवं भिन्नमर्यादान् किं भवान् न निगर्हति ॥ २६ ॥ इस प्रकार वे सब-के-सब पापी और अधार्मिक हैं। पांचालोंने भी धर्मकी मर्यादा तोड़ डाली है। इस तरह मर्यादा भंग करनेवाले उन पाण्डवों और पांचालोंकी आप निन्दा क्यों नहीं करते हैं? ॥ २६ ॥ पितृहन्तॄनहं हत्वा पञ्चालान् निशि सौप्तिके । कामं कीटः पतङ्गो वा जन्म प्राप्य भवामि वै ॥ २७ ॥ पिताकी हत्या करनेवाले पांचालोंका रातको सोते समय वध करके मैं भले ही दूसरे जन्ममें कीट या पतंग हो जाऊँ, सब कुछ स्वीकार है ॥ २७ ॥ त्वरे चाहमनेनाद्य यदिदं मे चिकीर्षितम् । तस्य मे त्वरमाणस्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ॥ २८ ॥