महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3009, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैव तस्य वपुः शक्यं प्रवक्तुं वेष एव च ।
सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेयुरपि पर्वताः ॥ ७ ॥
उसके शरीर और वेषका वर्णन नहीं किया जा सकता। सर्वथा उसे देख लेनेपर पर्वत भी भयके मारे विदीर्ण हो सकते थे ॥ ७ ॥
तस्यास्यान्नासिकाभ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वशः ।
तेभ्यश्चाक्षिसहस्रेभ्यः प्रादुरासन् महार्चिषः ॥ ८ ॥
उसके मुखसे, दोनों नासिकाओंसे, कानोंसे और हजारों नेत्रोंसे भी सब ओर आगकी बड़ी-बड़ी लपटें निकल रही थीं ॥ ८ ॥
तथा तेजोमरीचिभ्यः शङ्खचक्रगदाधराः ।
प्रादुरासन् हृषीकेशाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९ ॥
उसके तेजकी किरणोंसे शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सैकड़ों, हजारों विष्णु प्रकट हो रहे थे ॥ ९ ॥
तदत्यद्भुतमालोक्य भूतं लोकभयंकरम् ।
द्रौणिरव्यथितो दिव्यैरस्त्रवर्षैरवाकिरत् ॥ १० ॥
सम्पूर्ण जगत्को भयभीत करनेवाले उस अद्भुत प्राणीको देखकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा भयभीत नहीं हुआ, अपितु उसके ऊपर दिव्य अस्त्रोंकी वर्षा करने लगा ॥ १० ॥
द्रौणिमुक्तान् शरांस्तांस्तु तद् भूतं महदग्रसत् ।
उदधेरिव वार्योघान् पावको वडवामुखः ॥ ११ ॥
परंतु जैसे बड़वानल समुद्रकी जलराशिको पी जाता है, उसी प्रकार उस महाभूतने अश्वत्थामाके छोड़े हुए सारे बाणोंको अपना ग्रास बना लिया ॥ ११ ॥
अग्रसत् तांस्तथाभूतं द्रौणिना प्रहितान् शरान् ।
अश्वत्थामा तु सम्प्रेक्ष्य शरौघांस्तान् निरर्थकान् ॥ १२ ॥
रथशक्तिं मुमोचासौ दीप्तामग्निशिखामिव ।
अश्वत्थामाने जो-जो बाण छोड़े, उन सबको वह महाभूत निगल गया। अपने बाण-समूहोंको व्यर्थ हुआ देख अश्वत्थामाने प्रज्वलित अग्निशिखाके समान देदीप्यमान रथशक्ति छोड़ी ॥ १२ ½ ॥
सा तमाहत्य दीप्ताग्रा रथशक्तिरदीर्यत ॥ १३ ॥
युगान्ते सूर्यमाहत्य महोल्केव दिवश्च्युता ।
उसका अग्रभाग तेजसे प्रकाशित हो रहा था। वह रथ-शक्ति उस महापुरुषसे टकराकर उसी प्रकार विदीर्ण हो गयी, जैसे प्रलयकालमें आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्का सूर्यसे टकराकर नष्ट हो जाती है ॥
अथ हेमत्सरुं दिव्यं खड्गमाकाशवर्चसम् ॥ १४ ॥