भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3016, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3016

मुखवाले थे तो कोई बाजके समान। राजन्! किन्हीं-किन्हींके तो सिर ही नहीं थे। भारत! कोई-कोई भालूके समान मुखवाले थे। उन सबके नेत्र और जिह्वाएँ तेजसे प्रज्वलित हो रही थीं। अंगोंकी कान्ति आगकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी ॥ २१-२२ ॥ ज्वालाकेशाश्च राजेन्द्र ज्वलद्रोमचतुर्भुजाः । मेषवक्त्रास्तथैवान्ये तथा छागमुखा नृप ॥ २३ ॥ राजेन्द्र! उनके केश भी अग्नि-शिखाके समान प्रतीत होते थे। उनका रोम-रोम प्रज्वलित हो रहा था। उन सबके चार भुजाएँ थीं। नरेश्वर! कितने ही गणोंके मुख भेड़ों और बकरोंके समान थे ॥ २३ ॥ शङ्खाभाः शङ्खवक्त्राश्च शङ्खवर्णास्तथैव च । शङ्खमालापरिकराः शङ्खध्वनिसमस्वनाः ॥ २४ ॥ कितनोंके मुख, वर्ण और कान्ति शंखके सदृश थे। वे शंखकी मालाओंसे अलंकृत थे और उनके मुखसे शंखध्वनिके समान ही शब्द प्रकट होते थे ॥ जटाधराः पञ्चशिखास्तथा मुण्डाः कृशोदराः । चतुर्दंष्ट्राश्चतुर्जिह्वाः शङ्कुकर्णाः किरीटिनः ॥ २५ ॥ कोई समूचे सिरपर जटा धारण करते थे, कोई पाँच शिखाएँ रखते थे और कितने ही मूँड़ मुड़ाये रहते थे। बहुतोंके उदर अत्यन्त कृश थे, कितनोंके चार दाढ़ें और चार जिह्वाएँ थीं। किन्हींके कान खूँटीके समान जान पड़ते थे और कितने ही पार्षद अपने मस्तकपर किरीट धारण करते थे ॥ २५ ॥ मौञ्जीधराश्च राजेन्द्र तथा कुञ्चितमूर्धजाः । उष्णीषिणो मुकुटिनश्चारुवक्त्राः स्वलङ्कृताः ॥ २६ ॥ राजेन्द्र! कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे, किन्हींके सिरके बाल घुँघराले दिखायी देते थे, कोई पगड़ी धारण किये हुए थे तो कोई मुकुट। कितनोंके मुख बड़े ही मनोहर थे। कितने ही सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २६ ॥ पद्मोत्पलापीडधरास्तथा मुकुटधारिणः । माहात्म्येन च संयुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७ ॥ कोई अपने मस्तकपर कमलों और कुमुदोंका किरीट धारण करते थे। बहुतोंने विशुद्ध मुकुट धारण कर रखा था। वे भूतगण सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें थे और सभी अद्भुत माहात्म्यसे सम्पन्न थे ॥ शतघ्नीवज्रहस्ताश्च तथा मुसलपाणयः । भुशुण्डीपाशहस्ताश्च दण्डहस्ताश्च भारत ॥ २८ ॥ भारत! उनके हाथोंमें शतघ्नी, वज्र, मूसल, भुशुण्डी, पाश और दण्ड शोभा पाते थे ॥ २८ ॥ पृष्ठेषु बद्धेषुधयश्चित्रबाणोत्कटास्तथा ।

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